Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1550

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दा꣡शे꣢म꣣ क꣢स्य꣣ म꣡न꣢सा य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सहसो यहो । क꣡दु꣢ वोच इ꣣दं꣡ नमः꣢꣯ ॥१५५०॥

दा꣡शे꣢꣯म । क꣡स्य꣢꣯ । म꣡न꣢꣯सा । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । स꣣हसः । यहो । क꣢त् । उ꣣ । वोचे । इद꣢म् । न꣡मः꣢꣯ ॥१५५०॥

Mantra without Swara
दाशेम कस्य मनसा यज्ञस्य सहसो यहो । कदु वोच इदं नमः ॥

दाशेम । कस्य । मनसा । यज्ञस्य । सहसः । यहो । कत् । उ । वोचे । इदम् । नमः ॥१५५०॥

Samveda - Mantra Number : 1550
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सहसः यहो) बल के पुत्र अर्थात् अत्यन्त बली परमेश्वर ! (कस्य यज्ञस्य मनसा) किस यज्ञ के मन से, हम आपको (दाशेम) आत्मसमर्पण करें ? (कत् उ) कैसे मैं (इदं नमः) इस नमस्कार को (वोचे) आपके प्रति कहूँ ? ॥२॥
Essence
अनेक सकाम यज्ञ और निष्काम यज्ञ प्रचलित हैं। पर मैं तो हे जगदीश्वर ! आपकी उपासना ही जिसका प्रयोजन है, ऐसे यज्ञ से ही आपको आत्मसमर्पण करता हूँ, किसी स्वार्थ को मन में रखकर नहीं। कैसे मैं आपको नमस्कार करूँ ? कुछ लोग साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं, कोई अञ्जलि बाँधकर प्रणाम करते हैं, कोई मूर्ति पर सिर नवाकर प्रणाम करते हैं, पर मैं तो चित्त को ही तेरे प्रति नवाता हूँ, शरीर के अङ्गों को नहीं ॥२॥
Subject
आगे फिर प्रश्न करते हैं।