Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1541

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡त्ते꣢ बृ꣣ह꣡न्तो꣢ अ꣣र्च꣡यः꣢ समिधा꣣न꣡स्य꣢ दीदिवः । अ꣡ग्ने꣢ शु꣣क्रा꣡स꣢ ईरते ॥१५४१॥

उ꣢त् । ते꣣ । बृह꣡न्तः꣢ । अ꣣र्च꣡यः꣢ । स꣣मिधा꣡न꣢स्य । स꣣म् । इधान꣡स्य꣢ । दी꣣दिवः । अ꣡ग्ने꣢꣯ । शु꣣क्रा꣡सः꣢ । ई꣣रते ॥१५४१॥

Mantra without Swara
उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः । अग्ने शुक्रास ईरते ॥

उत् । ते । बृहन्तः । अर्चयः । समिधानस्य । सम् । इधानस्य । दीदिवः । अग्ने । शुक्रासः । ईरते ॥१५४१॥

Samveda - Mantra Number : 1541
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (दीदिवः) सत्य के प्रकाशक, (अग्ने) विज्ञानवान् जगन्नायक परमात्मन् ! (समिधानस्य) देदीप्यमान (ते) आपकी (बृहन्तः) महान्, (शुक्रासः) पवित्र (अर्चयः) दीप्तियाँ (उदीरते) उठ रही हैं ॥१॥
Essence
जब उपासक परमात्मा में तन्मय हो जाता है, तब भौतिक अग्नि की ज्वालाओं के समान उसका तेजस्वी रूप उसके सामने प्रकट हो जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा का तेज वर्णित करते हैं।