Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1534

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡द꣢ग्ने꣣ शु꣡च꣢य꣣स्त꣡व꣢ शु꣣क्रा꣡ भ्राज꣢꣯न्त ईरते । त꣢व꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्य꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥

उत् । अ꣣ग्ने । शु꣡च꣢꣯यः । त꣡व꣢꣯ । शु꣣क्राः꣢ । भ्रा꣡ज꣢꣯न्तः । ई꣣रते । त꣡व꣢꣯ । ज्यो꣡ती꣢꣯ꣳषि । अ꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥

Mantra without Swara
उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते । तव ज्योतीꣳष्यर्चयः ॥

उत् । अग्ने । शुचयः । तव । शुक्राः । भ्राजन्तः । ईरते । तव । ज्योतीꣳषि । अर्चयः ॥१५३४॥

Samveda - Mantra Number : 1534
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) तेजस्वी परमात्मन् ! (तव) आपकी रची हुई (शुचयः) पवित्र, (शुक्राः) प्रदीप्त, (भ्राजन्तः) जगमगानेवाली (अर्चयः) बिजली, सूर्य आदि की प्रभाएँ (तव ज्योतींषि) आपकी ज्योतियों को (उदीरते) प्रकट कर रही हैं ॥ उपनिषद् के ऋषि ने भी कहा है—परमेश्वर की चमक के आगे न सूर्य की कुछ चमक है, न चाँद-तारों की चमक है, न बिजलियों की चमक है। उसी की चमक से जगत् का यह सब कुछ चमक रहा है (कठ० ५।१५) ॥३॥
Essence
इस ब्रह्माण्ड में आग, बिजली, सूर्य, तारे आदि जो भी ज्योतियाँ हैं, वे सब मिलकर भी ब्रह्म की महा-ज्योति की एक किनकी भी प्रकट करने में असमर्थ हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा और अग्नि तत्त्व का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥ सप्तम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्माग्नि का विषय है।