Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1527

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- केतुराग्नेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡ꣳ हि꣢न्वन्तु नो꣣ धि꣢यः꣣ स꣡प्ति꣢मा꣣शु꣡मि꣢वा꣣जि꣡षु꣢ । ते꣡न꣢ जेष्म꣣ ध꣡नं꣢धनम् ॥१५२७॥

अ꣣ग्नि꣢म् । हि꣣न्वन्तु । नः । धि꣡यः꣢꣯ । स꣡प्ति꣢꣯म् । आ꣣शु꣢म् । इ꣣व । आजि꣡षु꣢ । ते꣡न꣢꣯ । जे꣣ष्म । ध꣡नं꣢꣯धनम् । ध꣡न꣢꣯म् । ध꣣नम् ॥१५२७॥

Mantra without Swara
अग्निꣳ हिन्वन्तु नो धियः सप्तिमाशुमिवाजिषु । तेन जेष्म धनंधनम् ॥

अग्निम् । हिन्वन्तु । नः । धियः । सप्तिम् । आशुम् । इव । आजिषु । तेन । जेष्म । धनंधनम् । धनम् । धनम् ॥१५२७॥

Samveda - Mantra Number : 1527
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(नः) हमारी (धियः) ध्यान-क्रियाएँ वा बुद्धियाँ (अग्निम्) अग्रनायक परमात्मा वा राजा को (हिन्वन्तु) प्रेरित करें, (आजिषु) युद्धों में (आशुं सप्तिम् इव) जैसे वेगवान् घोड़े को प्रेरित करते हैं। (तेन) उस परमात्मा वा राजा के द्वारा (धनं धनम्) प्रत्येक आध्यात्मिक वा भौतिक ऐश्वर्य को, हम (जेष्म) जीत लेवें ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
दिव्य सम्पदाओं और भौतिक सम्पदाओं की प्राप्ति के लिए परमेश्वर और राजा परम सहायक होते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा और राजा का विषय है।