Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1511

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
न꣢ ह्या꣣꣬ꣳ३꣱ग꣢ पु꣣रा꣢ च꣣ न꣢ ज꣣ज्ञे꣢ वी꣣र꣡त꣢र꣣स्त्व꣢त् । न꣡ की꣢ रा꣣या꣢꣫ नैवथा꣣ न꣢ भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥

न । हि । अ꣣ङ्ग꣢ । पु꣣रा꣢ । च꣣ । न꣢ । ज꣣ज्ञे꣢ । वी꣣र꣡त꣢रः । त्वत् । न । किः꣣ । राया꣢ । न । ए꣣व꣡था꣢ । न । भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥

Mantra without Swara
न ह्याꣳ३ग पुरा च न जज्ञे वीरतरस्त्वत् । न की राया नैवथा न भन्दना ॥

न । हि । अङ्ग । पुरा । च । न । जज्ञे । वीरतरः । त्वत् । न । किः । राया । न । एवथा । न । भन्दना ॥१५११॥

Samveda - Mantra Number : 1511
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अङ्ग) प्रिय परमेश्वर ! (पुरा च न) पहले भी (त्वत्) आपकी अपेक्षा (वीरतरः) अधिक वीर (न जज्ञे) कोई उत्पन्न नहीं हुआ, [अब नहीं है और भविष्य में नहीं होगा, इसका तो कहना ही क्या।] (न किः) न ही (राया) धन में(न एवथा) न गति कर्म व रक्षा में और (न) ही (भन्दना) कल्याण में आपसे अधिक कोई उत्पन्न हुआ है वा होगा ॥३॥
Essence
जगदीश्वर से अधिक वीर, धनी, कर्मण्य, रक्षक और कल्याणकारी अन्य कोई भी न हुआ, न है, न होगा। इसलिए अपने सुख और शान्ति के लिए उसी की वन्दना सबको करनी चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र परमात्मा की महिमा का वर्णन है।