Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1501

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣हं꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना꣣ गि꣡रः꣢ शुम्भामि कण्व꣣व꣢त् । ये꣢꣫नेन्द्रः꣣ शु꣢ष्म꣣मि꣢द्द꣣धे꣢ ॥१५०१॥

अ꣣ह꣢म् । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । ज꣡न्म꣢꣯ना । गि꣡रः꣢꣯ । शु꣣म्भाभि । कण्वव꣢त् । ये꣡न꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । शु꣡ष्म꣢꣯म् । इत् । द꣣धे꣢ ॥१५०१॥

Mantra without Swara
अहं प्रत्नेन जन्मना गिरः शुम्भामि कण्ववत् । येनेन्द्रः शुष्ममिद्दधे ॥

अहम् । प्रत्नेन । जन्मना । गिरः । शुम्भाभि । कण्ववत् । येन । इन्द्रः । शुष्मम् । इत् । दधे ॥१५०१॥

Samveda - Mantra Number : 1501
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अहम्) मैं महत्वाकाङ्क्षी जन (प्रत्नेन जन्मना) आचार्य के पास से प्राप्त श्रेष्ठ जन्म से (कण्ववत्) मेधावी विद्वान् के समान (गिरः) अपनी वाणियों को (शुम्भामि) सत्य भाषण से अलङ्कृत करता हूँ, (येन) जिससे (इन्द्रः) मेरा जीवात्मा (शुष्मम् इत्) बल को ही (दधे) धारण करता है ॥२॥
Essence
आचार्य और सावित्री के पास से द्वितीय जन्म ग्रहण कर, द्विज होकर जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का ही अनुष्ठान करता है, वह पवित्र आत्मावाला और सबल आत्मावाला होकर सबसे सत्कार पाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।