Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1484

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बृहद्दिव आथर्वणः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वा꣣वृधानः꣡ शव꣢꣯सा꣣ भू꣡र्यो꣢जाः꣣ श꣡त्रु꣢र्दा꣣सा꣡य꣢ भि꣣य꣡सं꣢ दधाति । अ꣡व्य꣢नच्च व्य꣣न꣢च्च꣣ स꣢स्नि꣣ सं꣡ ते꣢ नवन्त꣣ प्र꣡भृ꣢ता꣣ म꣡दे꣢षु ॥१४८४॥

वा꣣वृधानः꣢ । श꣡व꣢꣯सा । भू꣡र्यो꣢꣯जाः । भू꣡रि꣢꣯ । ओ꣣जाः । श꣡त्रुः꣢꣯ । दा꣣सा꣡य꣢ । भि꣣य꣡स꣢म् । द꣣धाति । अ꣡व्य꣢꣯नत् । अ । व्य꣣नत् । च । व्यन꣢त् । वि꣣ । अन꣢त् । च꣣ । स꣡स्नि꣢꣯ । सम् । ते꣣ । नवन्त । प्र꣡भृ꣢꣯ता । प्र । भृ꣣ता । म꣡दे꣢꣯षु ॥१४८४॥

Mantra without Swara
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासाय भियसं दधाति । अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु ॥

वावृधानः । शवसा । भूर्योजाः । भूरि । ओजाः । शत्रुः । दासाय । भियसम् । दधाति । अव्यनत् । अ । व्यनत् । च । व्यनत् । वि । अनत् । च । सस्नि । सम् । ते । नवन्त । प्रभृता । प्र । भृता । मदेषु ॥१४८४॥

Samveda - Mantra Number : 1484
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(शवसा) बल से (वावृधानः) अतिशय बढ़ा हुआ, (भूर्योजाः) बहुत प्रतापी, (शत्रुः) दुष्टों का विनाश करनेवाला इन्द्र परमेश्वर (दासाय) यज्ञ आदि सत्कर्मों का विध्वंस करनेवाले को (भियसम्) भय (दधाति) देता है। हे इन्द्र परमात्मन् ! (अव्यनच्च) निर्जीव (व्यनत् च) और सजीव जगत् (सस्नि) आपसे ही संस्नात होता अर्थात् शुद्ध किया जाता है। हे देव ! (ते) आपके द्वारा उत्पन्न (मदेषु) आनन्दों में (प्रभृता) प्रकृष्टरूप से धारण और पुष्ट किये गये सब प्राणी (सन्नवन्त) आपकी स्तुति करते हैं ॥२॥
Essence
अनन्त बलवाले जगदीश्वर से दुष्ट लोग भय खाते हैं और सज्जन उससे पालित-पोषित होकर श्रद्धा से उसकी बारम्बार स्तुति करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जगदीश्वर का प्रताप वर्णित है।