Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1481

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते꣡ जा꣢नत꣣ स्व꣢मो꣣क्यं꣢३꣱सं꣢ व꣣त्सा꣢सो꣣ न꣢ मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मि꣣थो꣡ न꣢सन्त जा꣣मि꣡भिः꣢ ॥१४८१॥

ते । जा꣣नत । स्व꣢म् । ओ꣣क्य꣢म् । सम् । व꣣त्सा꣡सः꣢ । न । मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मि꣣थः꣢ । न꣣सन्त । जामि꣡भिः꣢ ॥१४८१॥

Mantra without Swara
ते जानत स्वमोक्यं३सं वत्सासो न मातृभिः । मिथो नसन्त जामिभिः ॥

ते । जानत । स्वम् । ओक्यम् । सम् । वत्सासः । न । मातृभिः । मिथः । नसन्त । जामिभिः ॥१४८१॥

Samveda - Mantra Number : 1481
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(ते) वे परमेश्वर के उपासक (स्वम्) अपने (ओक्यम्) हृदय-सदन में विद्यमान परमात्माग्नि को (जानत) उपास्य रूप में जानते हैं और फिर उस परमेश्वर को उपासने के लिए (मिथः) आपस में (जामिभिः) माँ-बहिन आदियों के साथ (सं नसन्त) मिलकर बैठते हैं, (वत्सासः न) जैसे बछड़े (मातृभिः) अपनी माताओं गौओं के साथ (सं नसन्त) मिलते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे बछड़े प्रेम से गौओं के साथ रहते हैं, वैसे ही घर के बालक से लेकर बूढ़े तक सब लोग आपस में एक साथ बैठकर परमात्मा की उपासना किया करें ॥२॥
Subject
आगे फिर उसी विषय में कहा गया है।