Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1480

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ सु꣣ते꣡ सि꣢ञ्च꣣त श्रि꣢य꣣ꣳ रो꣡द꣢स्योरभि꣣श्रि꣡य꣢म् । र꣣सा꣡ द꣢धीत वृष꣣भ꣢म् ॥१४८०॥

आ꣢ । सु꣢ते꣡ । सि꣢ञ्चत । श्रि꣡य꣢꣯म् । रो꣡द꣢꣯स्योः । अ꣣भिश्रि꣡य꣢म् । अ꣣भि । श्रि꣡य꣢꣯म् । र꣣सा꣢ । द꣣धीत । वृषभ꣢म् ॥१४८०॥

Mantra without Swara
आ सुते सिञ्चत श्रियꣳ रोदस्योरभिश्रियम् । रसा दधीत वृषभम् ॥

आ । सुते । सिञ्चत । श्रियम् । रोदस्योः । अभिश्रियम् । अभि । श्रियम् । रसा । दधीत । वृषभम् ॥१४८०॥

Samveda - Mantra Number : 1480
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (सुते) भक्तिरस के उमड़ने पर (रोदस्योः) द्युलोक और भूलोक के (अभिश्रियम्) शोभा-सम्पादक, (श्रियम्) आश्रय लेने योग्य अग्नि-नामक जगदीश्वर को (आ सिञ्चत) भक्तिरस से नहलाओ। (रसा) जगदीश्वर से निकली हुई आनन्दरस की नदी (वृषभम्) तुम्हारे ज्ञानसिक्त जीवात्मा को (दधीत) बल और पुष्टि प्रदान करे ॥१॥ यहाँ ‘श्रियम्’ की पुनरुक्ति में यमक अलङ्कार है ॥१॥
Essence
जब परमेश्वर के उपासक उसके प्रति भक्तिरस की नदी प्रवाहित करते हैं, तब परमेश्वर उनके प्रति आनन्द-रस की नदी बहाता है ॥३॥
Subject
प्रारम्भ में उपास्य उपासक का विषय वर्णन करते हैं।