Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1459

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣣भङ्गी꣡ शूरो꣢꣯ म꣣घ꣡वा꣢ तु꣣वी꣡म꣢घः꣣ स꣡म्मि꣢श्लो वी꣣꣬र्या꣢꣯य꣣ क꣢म् । उ꣣भा꣡ ते꣢ बा꣣हू꣡ वृष꣢꣯णा शतक्रतो꣣ नि꣡ या वज्रं꣢꣯ मिमि꣣क्ष꣡तुः꣢ ॥१४५९॥

प्रभङ्गी꣢ । प्र꣣ । भङ्गी꣢ । शू꣡रः꣢꣯ । म꣣घ꣡वा꣢ । तु꣣वी꣡म꣣घः । तु꣣वि꣢ । म꣣घः । सं꣡मि꣢꣯श्लः । सम् । मि꣣श्लः । वी꣢꣯र्याय । कम् । उ꣣भा꣢ । ते꣣ । बाहू꣡इति꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णा । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । नि꣢ । या । व꣡ज्र꣢꣯म् । मि꣣मिक्ष꣡तुः꣢ ॥१४५९॥

Mantra without Swara
प्रभङ्गी शूरो मघवा तुवीमघः सम्मिश्लो वीर्याय कम् । उभा ते बाहू वृषणा शतक्रतो नि या वज्रं मिमिक्षतुः ॥

प्रभङ्गी । प्र । भङ्गी । शूरः । मघवा । तुवीमघः । तुवि । मघः । संमिश्लः । सम् । मिश्लः । वीर्याय । कम् । उभा । ते । बाहूइति । वृषणा । शतक्रतो । शत । क्रतो । नि । या । वज्रम् । मिमिक्षतुः ॥१४५९॥

Samveda - Mantra Number : 1459
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे जगदीश्वर ! आप (प्रभङ्गी) दुष्टों और दुर्गुणों के तीव्र भञ्जक, (शूरः) वीर, (मघवा) ऐश्वर्यवान्, (तुवीमघः) बहुत दानी और (वीर्याय) हमें बल प्रदान करने के लिए (कम्) निश्चय ही (सम्मिश्लः) हमसे मिलनेवाले, हमारे साथ सखित्व स्थापित करनेवाले हो। हे (शतक्रतो) बहुत प्रज्ञा तथा बहुत कर्मोंवाले ! (उभा) दोनों (वृषणा) वर्षा करनेवाले वायु और सूर्य (ते) आपकी (बाहू) बाहुएँ हैं, (या) जो (वज्रम्) जल को (नि मिमिक्षतुः) निरन्तर सींचा करती हैं ॥२॥ यहाँ वर्षक वायु और सूर्य में बाहुओं के आरोप के कारण रूपक अलङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे कोई बाहुधारी मनुष्य बाहुओं में घड़ा आदि पकड़कर भूमि पर जल सींचता है, वैसे ही जगदीश्वर वायु और सूर्य रूप बाहुओं में मेघ रूप घड़े को लेकर वर्षाजल भूमि पर बरसाता है ॥२॥ इस खण्ड में सूर्य के वर्णन द्वारा तथा प्रत्यक्षतः भी परमात्मा की महिमा का वर्णन होने से और उसके प्रति प्रार्थना होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तेरहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के गुणकर्मों का वर्णन है।