Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1454

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- विभ्राट् सौर्यः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि꣣भ्रा꣢ड् बृ꣣ह꣡त्सुभृ꣢꣯तं वाज꣣सा꣡त꣢मं꣣ ध꣡र्मं꣢ दि꣣वो꣢ ध꣣रु꣡णे꣢ स꣣त्य꣡मर्पि꣢꣯तम् । अ꣣मित्रहा꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢स्यु꣣ह꣡न्त꣢मं꣣ ज्यो꣡ति꣢र्जज्ञे असुर꣣हा꣡ स꣢पत्न꣣हा꣢ ॥१४५४॥

वि꣣भ्रा꣢ट् । वि꣣ । भ्रा꣢ट् । बृ꣣ह꣢त् । सु꣡भृ꣢꣯तम् । सु । भृ꣣तम् । वाजसा꣡त꣢मम् । वा꣣ज । सा꣡त꣢꣯मम् । ध꣡र्म꣢꣯न् । दि꣣वः꣢ । ध꣣रु꣡णे꣢ । स꣣त्य꣢म् । अ꣡र्पि꣢꣯तम् । अ꣣मित्रहा꣢ । अ꣣मित्र । हा꣢ । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । द꣣स्युह꣡न्त꣢मम् । द꣣स्यु । ह꣡न्त꣢꣯मम् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣣ज्ञे । असुरहा꣢ । अ꣣सुर । हा꣢ । स꣣पत्नहा꣢ । स꣣पत्न । हा꣢ ॥१४५४॥

Mantra without Swara
विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मं दिवो धरुणे सत्यमर्पितम् । अमित्रहा वृत्रहा दस्युहन्तमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा ॥

विभ्राट् । वि । भ्राट् । बृहत् । सुभृतम् । सु । भृतम् । वाजसातमम् । वाज । सातमम् । धर्मन् । दिवः । धरुणे । सत्यम् । अर्पितम् । अमित्रहा । अमित्र । हा । वृत्रहा । वृत्र । हा । दस्युहन्तमम् । दस्यु । हन्तमम् । ज्योतिः । जज्ञे । असुरहा । असुर । हा । सपत्नहा । सपत्न । हा ॥१४५४॥

Samveda - Mantra Number : 1454
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
देखो, (विभ्राट्) देदीप्यमान, (बृहत्) विशाल, (सुभृतम्) अत्यन्त पुष्ट, (वाजसातमम्) अन्न और बल की अतिशय देनेवाली, (सत्यम्) सत्य नियमोंवाली, (धर्मन्) ग्रहोपग्रहों के धारणकर्ता (दिवः धरुणे) द्युलोक के स्तम्भरूप सूर्य में (अर्पितम्) अर्पित, (अमित्रहा) रोग आदि शत्रुओं को नष्ट करनेवाली, (वृत्रहा) अन्धकार की विनाशक, (दस्युहन्तमम्) चोर आदि दस्युओं को दूर करनेवाली, (असुरहा) अप्रशस्त दुर्भिक्ष आदि को विनष्ट करनेवाली, (सपत्नहा) एक साथ आक्रमण करनेवाले रोग-कृमियों की विनाशक (ज्योतिः) सूर्य की ज्योति (जज्ञे) प्रादुर्भूत हुई है ॥२॥ यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है। ‘हा’ का चार बार प्रयोग होने के कारण वृत्त्यनुप्रास है। ‘तमं’ और ‘त्रहा’ के दो-दो बार प्रयोग में छेकानुप्रास है ॥२॥
Essence
रात्रि के घोर अन्धकार को विध्वस्त करती हुई सूर्य की ज्योति परमात्मा की आभा की ओर संकेत करती है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में सूर्य की ज्योति का वर्णन करके परमात्मा की महिमा प्रकाशित की गयी है।