Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1451

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣢व꣣ यो꣡ न꣢व꣣तिं꣡ पुरो꣢꣯ बि꣣भे꣡द꣢ बा꣣꣬ह्वो꣢꣯जसा । अ꣡हिं꣢ च वृत्र꣣हा꣡व꣢धीत् ॥१४५१॥

न꣡व꣢꣯ । यः । न꣣व꣢तिम् । पु꣡रः꣢꣯ । बि꣣भे꣡द꣢ । बा꣣ह्वो꣢जसा । बा꣣हु꣢ । ओ꣣जसा । अ꣡हि꣢꣯म् । च । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । अ꣣वधीत् ॥१४५१॥

Mantra without Swara
नव यो नवतिं पुरो बिभेद बाह्वोजसा । अहिं च वृत्रहावधीत् ॥

नव । यः । नवतिम् । पुरः । बिभेद । बाह्वोजसा । बाहु । ओजसा । अहिम् । च । वृत्रहा । वृत्र । हा । अवधीत् ॥१४५१॥

Samveda - Mantra Number : 1451
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो वीर (बाह्वोजसा) बाहुबल से (नव नवतिं पुरः) नव्वे-नव्वे शत्रु योद्धाओं के नौ व्यूहों को (बिभेद) तोड़ देता है और जो (वृत्रहा) शत्रुहन्ता वीर (अहिं च) मार-काट करनेवाले शत्रुदल को भी (अवधीत्) विध्वस्त कर देता है, वही राजा वा सेनापति बनने योग्य है ॥२॥
Essence
उसी मनुष्य को राजा के पद पर वा सेनापति के पद पर अभिषिक्त करना चाहिए, जो अकेला होता हुआ भी बहुत से शत्रुओं के छक्के छुड़ा सके ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में राजा वा सेनापति की शूरता का वर्णन है।