Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1409

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शू꣡र꣢ग्रामः꣣ स꣡र्व꣢वीरः꣣ स꣡हा꣢वा꣣ञ्जे꣡ता पवस्व꣣ स꣡नि꣢ता꣣ ध꣡ना꣢नि । ति꣣ग्मा꣡यु꣢धः क्षि꣣प्र꣡ध꣢न्वा स꣣म꣡त्स्वषा꣢꣯ढः सा꣣ह्वा꣡न्पृत꣢꣯नासु꣣ श꣡त्रू꣢न् ॥१४०९॥

शू꣡र꣢꣯ग्रामः । शू꣡र꣢꣯ । ग्रा꣣मः । स꣡र्व꣢꣯वीरः । स꣡र्व꣢꣯ । वी꣣रः । स꣡हा꣢꣯वान् । जे꣡ता꣢꣯ । प꣣वस्व । स꣡नि꣢꣯ता । ध꣡ना꣢꣯नि । ति꣣ग्मा꣡यु꣢धः । ति꣣ग्म꣢ । आ꣣युधः । क्षिप्र꣡ध꣢न्वा । क्षि꣣प्र꣢ । ध꣣न्वा । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । अ꣡षा꣢꣯ढः । सा꣣ह्वा꣢न् । पृ꣡त꣢꣯नासु । श꣡त्रू꣢꣯न् ॥१४०९॥

Mantra without Swara
शूरग्रामः सर्ववीरः सहावाञ्जेता पवस्व सनिता धनानि । तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाढः साह्वान्पृतनासु शत्रून् ॥

शूरग्रामः । शूर । ग्रामः । सर्ववीरः । सर्व । वीरः । सहावान् । जेता । पवस्व । सनिता । धनानि । तिग्मायुधः । तिग्म । आयुधः । क्षिप्रधन्वा । क्षिप्र । धन्वा । समत्सु । स । मत्सु । अषाढः । साह्वान् । पृतनासु । शत्रून् ॥१४०९॥

Samveda - Mantra Number : 1409
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—राजा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् वीर राजन् ! (शूरग्रामः) शूर योद्धा-गणवाले, (सर्ववीराः) सब वीर प्रजाओंवाले, (सहावान्) सहनशील, (जेता) विजयशील, (धनानि) ऐश्वर्यों के (सनिता) दाता, (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रोंवाले, (क्षिप्रधन्वा) शीघ्र धनुषवाले, (समत्सु) युद्धों में (अषाढः) परास्त न होनेवाले, (पृतनासु) शत्रु-सेनाओं में (शत्रून्) शत्रुओं को (साह्वान्) पराजित करनेवाले आप (पवस्व) पराक्रम दिखाओ ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे सोम जीवात्मन् ! (शूरग्रामः) शूर प्राण-गणवाला, (सर्ववीरः) जिसके मन, बुद्धि आदि सब वीर हैं ऐसा, (सहावान्) उत्साही, (जेता) विजयशील, (धनानि) सद्गुणरूप ऐश्वर्यों को (सनिता) प्राप्त करनेवाला, (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शत्रुदाहक तेजोंवाला, (क्षिप्रधन्वा) वेग से चलनेवाले प्रणव-जपरूप धनुषवाला, (समत्सु) आन्तरिक देवासुर संग्रामों में (अषाढः) पराजित न होनेवाला, (पृतनासु) काम, क्रोध आदि की सेनाओं में (शत्रून्) शत्रुओं को (साह्वान्) पराजित करनेवाला तू (पवस्व) क्रियाशील हो अथवा स्वयं को पवित्र रख ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है। विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार भी है। ऐसे विलक्षण गुणों से सुशोभित भी तू यदि विक्रम नहीं दिखाता, क्रियाशील नहीं होता अथवा पवित्र आचरण नहीं रखता, तो ये गुण भारस्वरूप ही होंगे, यह आशय है ॥२॥
Essence
देह में मनुष्य का आत्मा और राष्ट्र में राजा यदि शत्रुओं को पराजित करके योगक्षेम करते हैं, तो देह और राष्ट्र का स्वराज्य अक्षुण्ण रहता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में राजा और जीवात्मा को उद्बोधन देते हैं।