Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1408

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्रि꣢पृ꣣ष्ठं꣡ वृष꣢꣯णं वयो꣣धा꣡म꣢ङ्गो꣣षि꣡ण꣢मवावशन्त꣣ वा꣡णीः꣢ । व꣢ना꣣ व꣡सा꣢नो꣣ व꣡रु꣢णो꣣ न꣢꣫ सिन्धु꣣र्वि꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ द꣢यते꣣ वा꣡र्या꣢णि ॥१४०८॥

अ꣣भि꣢ । त्रि꣣पृष्ठ꣢म् । त्रि꣣ । पृष्ठ꣢म् । वृ꣡ष꣢꣯णम् । व꣣योधा꣢म् । व꣣यः । धा꣢म् । अ꣣ङ्गोषि꣡ण꣢म् । अ꣣वावशन्त । वा꣡णीः꣢꣯ । व꣡ना꣢꣯ । व꣡सा꣢꣯नः । व꣡रु꣢꣯णः । न । सि꣡न्धुः꣢꣯ । वि । र꣣त्न꣢धाः । र꣣त्न । धाः꣢ । द꣣यते । वा꣡र्या꣢꣯णि ॥१४०८॥

Mantra without Swara
अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामङ्गोषिणमवावशन्त वाणीः । वना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि रत्नधा दयते वार्याणि ॥

अभि । त्रिपृष्ठम् । त्रि । पृष्ठम् । वृषणम् । वयोधाम् । वयः । धाम् । अङ्गोषिणम् । अवावशन्त । वाणीः । वना । वसानः । वरुणः । न । सिन्धुः । वि । रत्नधाः । रत्न । धाः । दयते । वार्याणि ॥१४०८॥

Samveda - Mantra Number : 1408
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—राजा के पक्ष में। (वाणीः) प्रजाओं की वाणियाँ (त्रिपृष्ठम्) प्रजा, सभा-समिति और सेना इन तीन पृष्ठोंवाले, (वृषभम्) बलवान् वा सुखवर्षीं, (वयोधाम्) अन्न प्रदान करनेवाले, (अङ्गोषिणम्) राज्य के सब अङ्गों में व्याप्त होनेवाले राजा को (अभि अवावशन्त) प्रशंसित करती हैं। (वना) जंगलों को (वसानः) आच्छादित करते हुए (वरुणः न) अग्नि के समान (वना) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ वह राजा (सिन्धुः) समुद्र के समान (रत्नधाः) रत्नों को धारण करनेवाला होता हुआ (वार्याणि) वरणीय रत्नों अर्थात् रमणीय ऐश्वर्यों को (वि दयते) विशेषरूप से प्रजाओं को प्रदान करता है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (वाणीः) वेदवाणियाँ (त्रिपृष्ठम्) ज्ञान, कर्म, उपासना रूप तीन पृष्ठोंवाले, (वृषणम्) बलवान् वा बल बरसानेवाले, (वयोधाम्) आयु को धारण करनेवाले, (अङ्गोषिणम्) ईश-स्तुति करनेवाले जीवात्मा की (अभि अवावशन्त) स्तुति करती हैं अर्थात् महत्ता वर्णन करती हैं, ‘तू विद्वान् है, वर्चस्वी है, शरीर-रक्षक है। श्रेष्ठों से मिल, बराबरवालों से आगे बढ़ (अथ० २।११।४)’ । आदि मन्त्रों से आत्मा को उद्बोधन देती हैं। (वरुणः न) सूर्य के समान (वना) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ, (सिन्धुः) रत्नों के खजाने समुद्र के समान (रत्नधाः) रमणीय सद्गुणरूप रत्नों को धारण करनेवाला वह सोम जीवात्मा (वार्याणि) निवारण करने योग्य विघ्न आदियों को (विदयते) विशेषरूप से विनष्ट कर देता है ॥१॥ यहाँ श्लेष, श्लिष्टोपमा और लुप्तोपमा अलङ्कार हैं ॥१॥
Essence
जो राजा प्रजाओं का अनुरञ्जन करता है, प्रजा भी उसके गुणगान करती है। वैसे ही जो देहधारी जीवात्मा अपनी शक्ति को पहचानकर अपने तेजों से सब आन्तरिक और बाह्य विघ्नों का उन्मूलन करता है, वह सर्वत्र विजयलाभ करता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५२८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ राजा और जीवात्मा का विषय कहते हैं।