Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1402

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- तिरश्चीराङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ए꣢तो꣣ न्वि꣢न्द्र꣣ꣳ स्त꣡वा꣢म शु꣣द्ध꣢ꣳ शु꣣द्धे꣢न꣣ सा꣡म्ना꣢ । शु꣣द्धै꣢रु꣣क्थै꣡र्वा꣢वृ꣣ध्वा꣡ꣳस꣢ꣳ शु꣣द्धै꣢रा꣣शी꣡र्वा꣢न्ममत्तु ॥१४०२॥

आ꣢ । इ꣣त । उ । नु꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स्त꣡वा꣢꣯म । शु꣣द्ध꣢म् । शु꣣द्धे꣡न꣢ । सा꣡म्ना꣢꣯ । शु꣣द्धैः꣢ । उ꣣क्थैः꣢ । वा꣣वृ꣢ध्वाꣳस꣢म् । शु꣣द्धैः꣢ । आ꣣शी꣡र्वा꣢न् । आ꣣ । शी꣡र्वा꣢꣯न् । म꣣मत्तु ॥१४०२॥

Mantra without Swara
एतो न्विन्द्रꣳ स्तवाम शुद्धꣳ शुद्धेन साम्ना । शुद्धैरुक्थैर्वावृध्वाꣳसꣳ शुद्धैराशीर्वान्ममत्तु ॥

आ । इत । उ । नु । इन्द्रम् । स्तवाम । शुद्धम् । शुद्धेन । साम्ना । शुद्धैः । उक्थैः । वावृध्वाꣳसम् । शुद्धैः । आशीर्वान् । आ । शीर्वान् । ममत्तु ॥१४०२॥

Samveda - Mantra Number : 1402
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे साथियो ! (एत उ) आओ, (नु) शीघ्र ही, तुम और हम मिलकर (शुद्धेन साम्ना) शुद्ध स्तोत्र से (शुद्धम्) शुद्ध (इन्द्रम्)परमात्मा, आचार्य वा राजा के (स्तवाम) गुणों का वर्णन करें। (शुद्धैः उक्थैः) शुद्ध स्तोत्रों वा वेदपाठों से (वावृध्वांसम्) वृद्धि को प्राप्त प्रत्येक स्तोता, शिष्य वा प्रजाजन को (अशीर्वान्) आशीर्वादों वा गोदुग्धों का अधिपति वह परमात्मा, आचार्य वा राजा (शुद्धैः) शुद्ध आशीर्वादों वा शुद्ध गोदुग्धों से (ममत्तु) आनन्दित करे ॥१॥
Essence
स्तुति किये गये परमेश्वर, आचार्य और राजा स्तोताओं को आशीर्वाद देकर और दूध, घी आदि ऐश्वर्य देकर बढ़ाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३५० क्रमाङ्क पर अध्यात्म विषय में की गयी थी। यहाँ परमेश्वर, आचार्य और राजा का विषय वर्णित करते हैं।