Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1394

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋजिश्वा भारद्वाजः Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
आ꣡ सो꣢ता꣣ प꣡रि꣢ षिञ्च꣣ता꣢श्वं꣣ न꣡ स्तोम꣢꣯म꣣प्तु꣡र꣢ꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । व꣣नप्रक्ष꣡मु꣢द꣣प्रु꣡त꣢म् ॥१३९४॥

आ꣢ । सो꣣त । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣ञ्चत । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । स्तो꣡म꣢꣯म् । अ꣣प्तु꣡र꣢म् । र꣣जस्तु꣡र꣢म् । व꣣नप्रक्ष꣢म् । व꣣न । प्रक्ष꣢म् । उ꣣दप्रु꣡त꣢म् । उ꣣द । प्रु꣡त꣢꣯म् ॥१३९४॥

Mantra without Swara
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुरꣳ रजस्तुरम् । वनप्रक्षमुदप्रुतम् ॥

आ । सोत । परि । सिञ्चत । अश्वम् । न । स्तोमम् । अप्तुरम् । रजस्तुरम् । वनप्रक्षम् । वन । प्रक्षम् । उदप्रुतम् । उद । प्रुतम् ॥१३९४॥

Samveda - Mantra Number : 1394
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (स्तोमम्) स्तुति करने योग्य, (अप्तुरम्) प्राणों में गति देनेवाले, (रजस्तुरम्) पृथिवी, सूर्य आदि लोकों को गति देनेवाले, (वनप्रक्षम्) जंगलों को वर्षा-जल से सींचनेवाले, (उदप्रुतम्) जलों को बहानेवाले सोम-नामक परमात्मा को (आ सोत) दुहो अर्थात् उससे आनन्द-रस प्राप्त करो और उसे (अश्वं न) बादल के समान (परि सिञ्चत) चारों ओर बरसाओ ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे बादल भूमि को जल से सींचता है, वैसे ही उपासकों को चाहिए कि ब्रह्मानन्द से अपने तथा दूसरों के आत्मा को पुनः-पुनः सींचें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५८० क्रमाङ्क पर परमेश्वर की आराधना के विषय में की गयी थी। यहाँ ब्रह्मानन्द का विषय वर्णित करते हैं।