Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1385

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡द꣢ग्ने भारत द्यु꣣म꣡दज꣢꣯स्रेण꣣ द꣡वि꣢द्युतत् । शो꣢चा꣣ वि꣡ भा꣣ह्यजर ॥१३८५॥

उ꣢त् । अ꣣ग्ने । भारत । द्युम꣢त् । अ꣡ज꣢꣯स्रेण । अ । ज꣣स्रेण । द꣡वि꣢꣯द्युतत् । शो꣡च꣢꣯ । वि । भा꣣हि । अजर । अ । जर ॥१३८५॥

Mantra without Swara
उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत् । शोचा वि भाह्यजर ॥

उत् । अग्ने । भारत । द्युमत् । अजस्रेण । अ । जस्रेण । दविद्युतत् । शोच । वि । भाहि । अजर । अ । जर ॥१३८५॥

Samveda - Mantra Number : 1385
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (भारत) शरीर का भरण-पोषण करनेवाले, (अजर) अविनाशी (अग्ने) जीवात्मन् ! तुम (द्युमत्) शोभनीय रूप से (अजस्रेण) अविच्छिन्न तेज से (दविद्युतत्) अतिशय चमकते हुए (उत् शोच) उत्साहित होओ, (वि भाहि) विशेष यशस्वी होओ ॥३॥
Essence
मनुष्य का आत्मा जागरूक होकर मन, बुद्धि आदि का अधिष्ठातृत्व करता हुआ तेजस्वी, ब्रह्मवर्चस्वी होता हुआ अपनी कीर्ति फैलाये ॥३॥
Subject
इस प्रकार परमेश्वर से प्रार्थना करके अब फिर जीवात्मा को उद्बोधन देते हैं।