Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1383

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡ग्ने꣢ यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि ये तवाश्वा꣢꣯सो देव सा꣣ध꣡वः꣢ । अ꣢रं꣣ व꣡ह꣢न्त्या꣣श꣡वः꣢ ॥१३८३॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । यु꣣ङ्क्ष्व꣢ । हि । ये । त꣡व꣢꣯ । अ꣡श्वा꣢꣯सः । दे꣣व । साध꣡वः꣢ । अ꣡र꣢꣯म् । व꣡ह꣢꣯न्ति । आ꣣श꣡वः꣢ ॥१३८३॥

Mantra without Swara
अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः । अरं वहन्त्याशवः ॥

अग्ने । युङ्क्ष्व । हि । ये । तव । अश्वासः । देव । साधवः । अरम् । वहन्ति । आशवः ॥१३८३॥

Samveda - Mantra Number : 1383
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (देव) ज्ञान से प्रकाशमान, (अग्ने) देह के अधिष्ठाता मेरे अन्तरात्मन् ! (ये तव) जो तुम्हारे (साधवः) भले (आशवः) शीघ्रगामी (अश्वासः) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय रूप घोड़े (अरम्) पर्याप्तरूप से (वहन्ति) देह-रथ को चलाते हैं, उन्हें (युङ्क्ष्व हि) कार्य में तत्पर करो ॥१॥
Essence
मनुष्य का आत्मा यदि सावधान नहीं है, तो उसके मन, इन्द्रिय आदि घोड़े कुमार्गगामी हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २५ क्रमाङ्क पर परमात्मा को सम्बोधित की गयी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधन है।