Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1378

1875 Mantra
Devata- आत्मा सूर्यो वा Rishi- सार्पराज्ञी Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्रि꣣ꣳश꣢꣫द्धाम꣣ वि꣡ रा꣢जति꣣ वा꣡क्प꣢त꣣ङ्गा꣡य꣢ धीयते । प्र꣢ति꣣ व꣢स्तो꣣र꣢ह꣣ द्यु꣡भिः꣢ ॥१३७८॥

त्रि꣣ꣳश꣢त् । धा꣡म꣢꣯ । वि । रा꣣जति । वा꣢क् । प꣣तङ्गा꣡य꣢ । धी꣣यते । प्र꣡ति꣢꣯ । व꣡स्तोः꣢꣯ । अ꣡ह꣢꣯ । द्यु꣡भिः꣢꣯ ॥१३७८॥

Mantra without Swara
त्रिꣳशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते । प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥

त्रिꣳशत् । धाम । वि । राजति । वाक् । पतङ्गाय । धीयते । प्रति । वस्तोः । अह । द्युभिः ॥१३७८॥

Samveda - Mantra Number : 1378
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
यह प्राण (त्रिंशद् धाम) दिन-रात के तीसों मुहूर्तों में (वि राजति) शरीर में विराजमान रहता है अर्थात् जाग्रत् अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्त अवस्था तीनों में सक्रिय रहता है, जैसा कि श्रुति है-‘प्राण अन्य सबके सो जाने पर भी खड़ा जागता रहता है’ (अथ० ११।४।२५)। इस (पतङ्गाय) श्वास-उच्छ्वास की गति से पक्षी के समान चेष्टा करनेवाले प्राण के लिए, अर्थात् प्राणयाम के काल में (वाक्) वाणी (धीयते) रोक ली जाती है, क्योंकि प्राणायाम करते हुए भाषण सम्भव नहीं है। (प्रति वस्तोः) प्रतिदिन (अह) निश्चय ही (द्युभिः) दीप्त-सूर्य-किरणों से यह प्राण बलवान् होता है ॥३॥
Essence
दिन-रात शरीर को धारण करता हुआ यह प्राण प्राणियों का महान् उपकार करता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मोपासना, जीवात्मा, प्राण और प्रसङ्गतः विद्युत् का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ ग्यारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
Subject
तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ६३२ क्रमाङ्क पर सूर्य और परमात्मा के ही विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ प्राण का विषय वर्णित है।