Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1372

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ꣣क्षा꣡ मि꣢मेति꣣ प्र꣡ति꣢ यन्ति धे꣣न꣡वो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ दे꣣वी꣡रुप꣢꣯ यन्ति निष्कृ꣣त꣢म् । अ꣡त्य꣢क्रमी꣣द꣡र्जु꣢नं꣣ वा꣡र꣢म꣣व्य꣢य꣣म꣢त्कं꣣ न꣢ नि꣣क्तं꣢꣫ परि꣣ सो꣡मो꣢ अव्यत ॥१३७२॥

उक्षा꣢ । मि꣣मेति । प्र꣡ति꣢꣯ । य꣣न्ति । धेन꣡वः꣢ । दे꣣व꣡स्य꣢ । दे꣣वीः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । निष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣣क्रमीत् । अ꣡र्जु꣢꣯नम् । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣣व्यय꣢म् । अ꣡त्क꣢꣯म् । न । नि꣣क्त꣢म् । प꣡रि꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣣व्यत ॥१३७२॥

Mantra without Swara
उक्षा मिमेति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुप यन्ति निष्कृतम् । अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमत्कं न निक्तं परि सोमो अव्यत ॥

उक्षा । मिमेति । प्रति । यन्ति । धेनवः । देवस्य । देवीः । उप । यन्ति । निष्कृतम् । निः । कृतम् । अति । अक्रमीत् । अर्जुनम् । वारम् । अव्ययम् । अत्कम् । न । निक्तम् । परि । सोमः । अव्यत ॥१३७२॥

Samveda - Mantra Number : 1372
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(उक्षा) प्राणरूप बैल (मिमेति) डकरा रहा है, (धेनवः) इन्द्रियरूप गाएँ (प्रति यन्ति) बाह्य विषयों से लौट रही हैं। (देवीः) दिव्यगुणोंवाली मनोवृत्तियाँ (देवस्य) प्रकाशक जीवात्मा के (निष्कृतम्) आश्रय को (उप यन्ति) प्राप्त कर रही हैं। यह सब क्यों हो रहा है? क्योंकि (सोमः) जीवात्मा ने (अति) विघ्नों का अतिक्रमण करके (अर्जुनम्) श्वेत, निर्मल, (अव्ययम्) अविनश्वर (वारम्) वरणीय परमात्मा की ओर (अक्रमीत्) पग बढ़ाये हैं और (निक्तम्) शुद्ध (अत्कं न) कवच के समान, उसे (परि अव्यत) चारों और धारण कर लिया है ॥३॥ चतुर्थ चरण में उपमालङ्कार है, उत्तरार्धगत कारण से पूर्वार्धगत कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है ॥३॥
Essence
परमात्मा के प्राप्त हो जाने पर जीव कवचधारी के समान रक्षित हो जाता है ॥३॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।