Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 137

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१३७॥

स꣢म् । अ꣣स्य । मन्य꣡वे꣢ । वि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । न꣣मन्त । कृष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्राय । स꣣म् । उद्रा꣡य꣢ । इ꣣व । सि꣡न्ध꣢꣯वः । ॥१३७॥

Mantra without Swara
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ॥

सम् । अस्य । मन्यवे । विशः । विश्वाः । नमन्त । कृष्टयः । समुद्राय । सम् । उद्राय । इव । सिन्धवः । ॥१३७॥

Samveda - Mantra Number : 137
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस परमैश्वर्यवान् पराक्रमशाली इन्द्र परमेश्वर के (मन्यवे) अन्याय, पाप अदि को सहन न करनेवाले तेज के लिए अर्थात् उस तेज को पाने के लिए (विश्वाः) सब (कृष्टयः) कृषि करनेवाली, अर्थात् मनोभूमि में सद्गुणरूप बीजों को बोनेवाली (विशः) प्रजाएँ, (सं नमन्त) परमेश्वर के प्रति नत हो जाती हैं, (समुद्राय) समुद्र को प्राप्त करने लिए (सिन्धवः इव) जैसे नदियाँ नत होती हैं अर्थात् नीचे की ओर बहती हैं ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
मन्यु उस मानसिक तेज को कहते हैं, जिसके कारण कोई अधर्म, दुराचार, पाप आदि को सहन नहीं कर सकता। इन्द्र नामक परमेश्वर उस मन्यु का आदर्श है। मन्यु के खजाने उस परमेश्वर के मन्यु को प्राप्त करने के लिए नम्रतापूर्वक सबको यत्न करना चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि परमात्मा के मन्यु के संमुख सब झुकते हैं।