Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1369

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢स्ते सोम सु꣣त꣡स्य꣢ पेया꣣त्क्र꣢त्वे꣣ द꣡क्षा꣢य꣣ वि꣡श्वे꣢ च दे꣣वाः꣢ ॥१३६९॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ते꣣ । सोम । सुत꣡स्य꣢ । पे꣣यात् । क्र꣡त्वे꣢꣯ । द꣡क्षा꣢꣯य । वि꣡श्वे꣢꣯ । च꣣ । देवाः꣢ ॥१३६९॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्ते सोम सुतस्य पेयात्क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः ॥

इन्द्रः । ते । सोम । सुतस्य । पेयात् । क्रत्वे । दक्षाय । विश्वे । च । देवाः ॥१३६९॥

Samveda - Mantra Number : 1369
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) ब्रह्मानन्द रस ! (सुतस्य) परमात्मा के पास से प्रवाहित हुए (ते) तुझे (क्रत्वे) कर्म करने के लिए और (बलाय) बल की प्राप्ति के लिए (इन्द्रः) जीवात्मा (पेयात्) पान करे, (विश्वे च देवाः) और अन्य सब प्रकाशक मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ आदि भी पान करें ॥३॥
Essence
ब्रह्मानन्द-रस के पान से मनुष्य आत्मबली और कर्मयोगी होता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा और ब्रह्मानन्द का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ ग्यारहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर उसी विषय में कहा गया है।