Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1366

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhand- पिपीलिकामध्या अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣢नु꣣ हि꣡ त्वा꣢ सु꣣त꣡ꣳ सो꣢म꣣ म꣡दा꣢मसि महे समर्यराज्ये । वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे ॥१३६६॥

अ꣡नु꣢꣯ । हि । त्वा꣣ । सुत꣢म् । सो꣣म । म꣡दा꣢꣯मसि । म꣣हे꣢ । स꣣मर्यरा꣡ज्ये꣢ । स꣣मर्य । रा꣡ज्ये꣢꣯ । वा꣡जा꣢꣯न् । अ꣣भि꣢ । प꣣वमान । प꣢ । गा꣣हसे ॥१३६६॥

Mantra without Swara
अनु हि त्वा सुतꣳ सोम मदामसि महे समर्यराज्ये । वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे ॥

अनु । हि । त्वा । सुतम् । सोम । मदामसि । महे । समर्यराज्ये । समर्य । राज्ये । वाजान् । अभि । पवमान । प । गाहसे ॥१३६६॥

Samveda - Mantra Number : 1366
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) ब्रह्माण्ड के सम्राट् जगदीश्वर ! (महे) महान् (समर्यराज्ये) देवासुरसङ्ग्राम से प्राप्त आन्तरिक साम्राज्य में, हम (सुतं त्वा) हृदय में प्रकट हुए आपको (अनु) लक्ष्य करके (मदामसि हि) मुदित होते हैं। हे (पवमान) पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (वाजान्) बलों में (अभि प्र गाहसे) अवगाहन करते हो, अतः हमें बल दो, यह भाव है ॥३॥
Essence
अपने अन्तरात्मा में छिपे हुए परमात्मा को प्रकट करके आत्मबल और परम आनन्द प्राप्त किया जा सकता है ॥३॥
Subject
तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ४३२ क्रमाङ्क पर परमात्मा, जीवात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा के विषय में व्याख्या की जा रही है।