Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1355

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣣दा꣢ प꣣णी꣡न꣢रा꣣ध꣢सो꣣ नि꣡ बा꣢धस्व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । न꣢꣫ हि त्वा꣣ क꣢श्च꣣ न꣡ प्रति꣢꣯ ॥१३५५॥

पदा꣢ । प꣣णी꣢न् । अ꣣राध꣡सः꣢ । अ꣣ । राध꣡सः꣢ । नि । बा꣣धस्व । महा꣢न् । अ꣣सि । न꣢ । हि । त्वा꣣ । कः꣢ । च꣣ । न꣢ । प्र꣡ति꣢꣯ ॥१३५५॥

Mantra without Swara
पदा पणीनराधसो नि बाधस्व महाꣳ असि । न हि त्वा कश्च न प्रति ॥

पदा । पणीन् । अराधसः । अ । राधसः । नि । बाधस्व । महान् । असि । न । हि । त्वा । कः । च । न । प्रति ॥१३५५॥

Samveda - Mantra Number : 1355
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र जीवात्मन् ! तू (अराधसः) दूसरों के कार्यों को सिद्ध न करनेवाले (पणीन्) स्वार्थभावों को (पदा) जैसे पैर की ठोकर मार कर किसी को दूर फेंक देते हैं, वैसे (नि बाधस्व) दूर फेंक दे, तू (महान्) महान् (असि) है, (त्वा) तुझे (कश्च न) कोई भी (प्रति नहि) प्रतिरुद्ध नहीं कर सकता है, अर्थात् तेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकता है ॥२॥ यहाँ ‘पदा’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे कोई पैर की ठोकर मार कर मार्ग की रुकावट को दूर फेंक देता है, वैसे ही जीवात्मा को चाहिए कि विघ्नरूप आन्तरिक शत्रुओं को दूर कर दे ॥२॥
Subject
आगे फिर जीवात्मा को उद्बोधन है।