Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1352

1875 Mantra
Devata- आदित्यः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सु꣣प्रावी꣡र꣢स्तु꣣ स꣢꣫ क्षयः꣣ प्र꣡ नु याम꣢꣯न्त्सुदानवः । ये꣡ नो꣢ अ꣡ꣳहो꣢ऽति꣣पि꣡प्र꣢ति ॥१३५२॥

सु꣣प्रावीः꣢ । सु꣣ । प्रावीः꣢ । अ꣣स्तु । सः꣢ । क्ष꣡यः꣢꣯ । प्र । नु । या꣡म꣢꣯न् । सु꣣दानवः । सु । दानवः । ये꣢ । नः꣣ । अ꣡ꣳहः꣢꣯ । अ꣣तिपि꣡प्र꣢ति । अ꣣ति । पि꣡प्र꣢꣯ति ॥१३५२॥

Mantra without Swara
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः । ये नो अꣳहोऽतिपिप्रति ॥

सुप्रावीः । सु । प्रावीः । अस्तु । सः । क्षयः । प्र । नु । यामन् । सुदानवः । सु । दानवः । ये । नः । अꣳहः । अतिपिप्रति । अति । पिप्रति ॥१३५२॥

Samveda - Mantra Number : 1352
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सुदानवः) शुभ दानवाले उपासक विद्वान् जनो ! (ये) जो आप लोग (नः) हमारे (अंहः) पाप वा अपराध को (अतिपिप्रति) दूर करते हो, उन आप लोगों के (यामन्) आगमन होने पर (सः) वह (क्षयः) हमारा निवासगृह (सुप्रावीः) भली- भाँति प्रकृष्टरूप से रक्षित (नु) शीघ्र ही (प्र अस्तु) प्रबलरूप से होवे ॥२॥
Essence
कर्तव्य और अकर्तव्य के उपदेशक उपासक विद्वान् जनों के समागम से लोग किसी भी पापकर्म में प्रवृत्त न होते हुए पुण्यशाली होते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में उपासक विद्वान् जनों को सम्बोधन है।