Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 135

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣हे꣡व꣢ शृण्व एषां꣣ क꣢शा꣣ ह꣡स्ते꣢षु꣣ य꣡द्वदा꣢꣯न् । नि꣡ यामं꣢꣯ चि꣣त्र꣡मृ꣢ञ्जते ॥१३५॥

इ꣣ह꣢ । इ꣣व । शृण्वे । एषाम् । क꣡शाः꣢꣯ । ह꣡स्ते꣢꣯षु । यत् । व꣡दा꣢꣯न् । नि । या꣡म꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ऋ꣣ञ्जते ॥१३५॥

Mantra without Swara
इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामं चित्रमृञ्जते ॥

इह । इव । शृण्वे । एषाम् । कशाः । हस्तेषु । यत् । वदान् । नि । यामन् । चित्रम् । ऋञ्जते ॥१३५॥

Samveda - Mantra Number : 135
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—सैनिकों के पक्ष में। (एषाम्) इन सैनिकों के (हस्तेषु) हाथों में, युद्धकाल में (यत्) जो (कशाः) चाबुकें (वदान्) बोलती हैं, वह इनका शब्द (इह इव) मानो यहीं, युद्ध से भिन्न स्थल में भी (शृण्वे) मैं सुन रहा हूँ। यह सैनिकों का गण (यामन्) संग्राम में (चित्रम्) अद्भुत (निऋञ्जते) प्रसाधन करता है ॥ वेद में सैनिकों का वेशप्रसाधन इस रूप में वर्णित हुआ है—तुम्हारे कंधों पर ऋष्टियाँ हैं, पैरों में पादत्राण हैं, वक्षःस्थलों पर सोने के तमगे हैं, तुम रथ पर शोभायमान हो। तुम्हारी बाहुओं में अग्नि के समान चमकनेवाले विद्युदस्त्र हैं, सिरों पर सुनहरी पगड़ियाँ हैं। ऋ० ५।५४।११, तुम उत्कृष्ट हथियारों से युक्त हो, गतिमान् हो, उत्कृष्ट स्वर्णालङ्कार धारण किये हो। ऋ० ७।५६।११। द्वितीय—प्राणों के पक्ष में। (एषाम्) इन प्राणों के (हस्तेषु) पूरक-कुम्भक क्रियारूप हाथों में (यत्) जो (कशाः) कानों से न सुनायी देनेवाली सूक्ष्म वाणियों (वदान्) ध्वनित होती हैं, उस आवाज को (इह इव) मानो यहीं, प्राणाभ्यास से अतिरिक्त दशा में भी (शृण्वे) सुन रहा हूँ। यह प्राणगण (यामन्) अभ्यास मार्ग में (चित्रम्) अद्भुत रूप से (निऋञ्जते) प्राणायामाभ्यासी योगी को योगैश्वर्यों से अलंकृत कर देता है ॥१॥ इस मन्त्र में भूतकाल की वस्तु को वर्तमान काल में प्रत्यक्ष घटित के समान वर्णन करने के कारण भाविक अलङ्कार है। सैनिक तथा प्राण इन दो अर्थों को अभिहित करने से श्लेष भी है ॥१॥
Essence
जैसे राजा के सहायक सैनिक लोग राष्ट्र की रक्षा करते हैं, वैसे ही योगी के सहायक प्राण योगी के योग की रक्षा करते हैं। युद्धों में शत्रुओं के सम्मुख सैनिकों की चाबुकें आवाज करती हैं, उस दृश्य को जिन्होंने देखा होता है, उससे चमत्कृत होने के कारण युद्ध से भिन्न स्थलों में भी उन्हें ऐसा लगता है कि वे आवाजें सुनायी दे रही हैं। सैनिकों का वीरोचित वेश-विन्यास भी अद्भुत ही प्रतीत होता है। प्राण भी योगियों के सैनिक ही हैं, जो शरीर में उत्पन्न सब दोषों को बाहर निकाल देते हैं, इन्द्रियों को निर्मल करते हैं और योगैश्वर्य की प्राप्ति के प्रयास को सफल बनाते हैं ॥१॥
Subject
अब इन्द्र के सहायक मरुतों का वर्णन करते हैं। यहाँ यद्यपि इन्द्र के सहायक मरुतों की स्तुति है, तथापि सैनिकों की स्तुति से सेनापति की ही स्तुति मानी जाती है, इस न्याय से देवता इन्द्र माना गया है। ऋग्वेद में इस मन्त्र के देवता साक्षात् ‘मरुतः’ ही है। इन्द्र से शरीर का सम्राट् जीवात्मा और राष्ट्र का सम्राट् राष्ट्रपति गृहीत होता है। जीवात्मा रूप इन्द्र के सहायक मरुत् प्राण हैं और राष्ट्रपति रूप इन्द्र के सहायक मरुत् सैनिक हैं, यह समझना चाहिए ॥