Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1343

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
क꣣दा꣡ मर्त꣢꣯मरा꣣ध꣡सं꣢ प꣣दा꣡ क्षुम्प꣢꣯मिव स्फुरत् । क꣣दा꣡ नः꣢꣯ शुश्रव꣣द्गि꣢र꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४३॥

क꣣दा꣢ । म꣡र्त꣢꣯म् । अ꣣राध꣡स꣢म् । अ꣣ । राध꣡स꣢म् । प꣣दा꣢ । क्षु꣡म्प꣢꣯म् । इ꣡व । स्फुरत् । कदा꣢ । नः꣣ । शुश्रवत् । गि꣡रः꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४३॥

Mantra without Swara
कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत् । कदा नः शुश्रवद्गिर इन्द्रो अङ्ग ॥

कदा । मर्तम् । अराधसम् । अ । राधसम् । पदा । क्षुम्पम् । इव । स्फुरत् । कदा । नः । शुश्रवत् । गिरः । इन्द्रः । अङ्ग ॥१३४३॥

Samveda - Mantra Number : 1343
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अङ्ग) हे भद्र ! (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा आप (कदा) कब (अराधसम्) समाज-सेवा न करनेवाले स्वार्थपरायण (मर्तम्) मनुष्य को (पदा) पैर से (क्षुम्पम् इव) खुम्भ के समान (स्फुरत्) विचलित कर दोगे, (कदा) कब (नः) हमें (गिरः) अपनी सन्देश-वाणियाँ (शुश्रवत्) सुनाओगे ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
परमात्मा के समान राजा भी दुष्टों को दण्डित करे और सज्जनों की वाणियाँ सुने तथा अपनी रमणीय, उपदेशप्रद वाणियाँ उन्हें सुनाये ॥३॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।