Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1341

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
य꣢꣫ एक꣣ इ꣢द्वि꣣द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ म꣡र्ता꣢य दा꣣शु꣡षे꣢ । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४१॥

यः꣢ । ए꣡कः꣢꣯ । इत् । वि꣣द꣢य꣢ते । वि꣣ । द꣡य꣢ते । व꣡सु꣢꣯ । म꣡र्ता꣢꣯य । दा꣣शु꣡षे꣢ । ई꣡शा꣢꣯नः । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः । इ꣡न्द्रः꣢ । अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४१॥

Mantra without Swara
य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे । ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग ॥

यः । एकः । इत् । विदयते । वि । दयते । वसु । मर्ताय । दाशुषे । ईशानः । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः । इन्द्रः । अङ्ग ॥१३४१॥

Samveda - Mantra Number : 1341
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः एक इत्) जो एक ही है और (दाशुषे) आत्मसमर्पण करनेवाले (मर्ताय) मनुष्य को (वसु) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव रूप ऐश्वर्य (विदयते) विशेषरूप से देता है। (अङ्ग) हे भाई ! वह (ईशानः) सबका शासक (अप्रतिष्कुतः) किसी से प्रतीकार न किया गया (इन्द्रः) इन्द्र नामक परमेश्वर है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (यः एकः इत्) जो अकेला ही, सब शत्रुओं को (विदयते) विनष्ट कर सके और (दाशुषे) कर देनेवाले (मर्ताय) प्रजाजन को (वसु) ऐश्वर्य (विदयते) प्रदान करे और जो (ईशानः) शासन में समर्थ तथा (अप्रतिष्कुतः) न लड़खड़ानेवाला हो, अङ्ग हे भाई ! वही (इन्द्रः) राजा बनाया जाना चाहिए ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
Essence
पाषाण आदि की मूर्ति परमेश्वर नहीं है, प्रत्युत जो एक, निराकार, स्तोताओं को ऐश्वर्य देनेवाला सर्वाधीश्वर है, वही परमेश्वर नाम से कहा जाता है। इसी प्रकार प्रजाओं द्वारा वही नर राजा रूप में चुना चाहिए जो अकेला भी अनेकों शत्रुओं को हरा सके और अपनी प्रजाओं का रञ्जन करे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३८९ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के विषय में की गयी थी। यहाँ परमात्मा और राजा का विषय वर्णित करते हैं।