Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1337

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡र्षा꣢ नः सोम꣣ शं꣡ गवे꣢꣯ धु꣣क्ष꣡स्व꣢ पि꣣प्यु꣢षी꣣मि꣡ष꣢म् । व꣡र्धा꣢ स꣣मु꣡द्र꣢मुक्थ्य ॥१३३७॥

अ꣡र्ष꣢꣯ । नः꣣ । सोम । श꣢म् । ग꣡वे꣢꣯ । धु꣣क्ष꣡स्व꣢ । पि꣣प्यु꣡षी꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् । व꣡र्ध꣢꣯ । स꣡मुद्र꣢म् । स꣣म् । उ꣢द्रम् । उ꣣क्थ्य ॥१३३७॥

Mantra without Swara
अर्षा नः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम् । वर्धा समुद्रमुक्थ्य ॥

अर्ष । नः । सोम । शम् । गवे । धुक्षस्व । पिप्युषीम् । इषम् । वर्ध । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । उक्थ्य ॥१३३७॥

Samveda - Mantra Number : 1337
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) जगत् के रचयिता शान्तिप्रिय परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (गवे) सारी धरती को (शम्) सुख-शान्ति (अर्ष) प्राप्त कराओ, हमें (पिप्युषीम्) समृद्ध (इषम्) अभीष्ट सम्पदा (धुक्ष्व) प्रदान करो। हे (उक्थ्य) स्तुतियोग्य ! (समुद्रम्) सद्गुणों के समुद्र जीवात्मा को अथवा उसमें विद्यमान आनन्द के समुद्र को (वर्ध) बढ़ाओ। जैसे सोम चन्द्रमा जलों के पारावार समुद्र को बढ़ाता है, यह यहाँ ध्वनित होता है ॥३॥
Essence
रमात्मा की कृपा से और मनुष्यों के प्रयत्न से सारी धरती सुख, शान्ति तथा प्रचुर सम्पदा प्राप्त करे और उसके निवासी आपस में प्रेम का व्यवहार करें ॥३॥ इस खण्ड में परत्मात्मा, ब्रह्मानन्द और गुरु-शिष्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ दशम अध्याय में एकादश खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।