Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1333

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣡ ते꣢ सो꣣ता꣢रो꣣ र꣢सं꣣ म꣡दा꣢य पु꣣न꣢न्ति꣣ सो꣡मं꣢ म꣣हे꣢ द्यु꣣म्ना꣡य꣢ ॥१३३३॥

प्र । ते꣣ । सोता꣡रः꣢ । र꣡स꣢꣯म् । म꣡दा꣢꣯य । पु꣣न꣡न्ति꣢ । सो꣡म꣢꣯म् । म꣣हे꣢ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ । शि꣡शु꣢꣯म् ॥१३३३॥

Mantra without Swara
प्र ते सोतारो रसं मदाय पुनन्ति सोमं महे द्युम्नाय ॥

प्र । ते । सोतारः । रसम् । मदाय । पुनन्ति । सोमम् । महे । द्युम्नाय । शिशुम् ॥१३३३॥

Samveda - Mantra Number : 1333
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे विद्यार्थी ! (सोतारः) द्वितीय जन्म देनेवाले गुरु लोग (सोमं रसम्) ज्ञान-रस को (ते) तेरे (मदाय) आनन्द के लिए और (महे द्युम्नाय) महान् यश के लिए (प्र पुनन्ति) भली-भाँति पवित्र कर रहे हैं ॥२॥
Essence
परोपकारक, पवित्र, निर्दोष विद्या से ही मनुष्य आनन्दवान् और यशस्वी होता है ॥२॥
Subject
आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।