Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1319

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥१३१९॥

श्रा꣡य꣢꣯न्तः । इ꣣व । सू꣡र्य꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । भ꣣क्षत । व꣡सू꣢꣯नि । जा꣣तः꣢ । ज꣡नि꣢꣯मानि । ओ꣡ज꣢꣯सा । प्र꣡ति꣢꣯ । भा꣣ग꣢म् । न । दी꣣धिमः ॥१३१९॥

Mantra without Swara
श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥

श्रायन्तः । इव । सूर्यम् । विश्वा । इत् । इन्द्रस्य । भक्षत । वसूनि । जातः । जनिमानि । ओजसा । प्रति । भागम् । न । दीधिमः ॥१३१९॥

Samveda - Mantra Number : 1319
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(श्रायन्तः इव) भोजन आदि को पकाते हुए मनुष्य जैसे (सूर्यम्) सूर्य का उपयोग करते हैं, अर्थात् सौर चूल्हा बनाकर उस पर भोजन पकाते हैं, वैसे ही तुम (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यशाली परमात्मा के, अर्थात् परमात्मा से उत्पन्न किये हुए (विश्वा इत् वसूनि) जल, अग्नि, बिजली, वायु, ओषधि आदि सभी धनों को (भक्षत) यथायोग्य सेवन करो। (जातः) वह प्रसिद्ध परमात्मा (ओजसा) अपने प्रताप से (जनिमानि) सभी उत्पन्न वस्तुओं को धारण करताहै। हम उसका (प्रति दीधिमः) ध्यान करते हैं, (भागं न) जैसे कोई अपने प्राप्तव्य दायभाग का ध्यान करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे सूर्य हमारे लिए प्राणों का स्रोत है, वैसे ही परमेश्वर से रचे हुए सभी पदार्थ अत्यधिक हितकर हैं। उनका यथायोग्य उपयोग सबको करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २६७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की गयी थी। यहाँ भी वही विषय वर्णित है।