Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1316

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वसुर्भारद्वाजः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡मो꣢ अरु꣣षो꣢꣫ वृषा꣣ ह꣢री꣣ रा꣡जे꣢व द꣣स्मो꣢ अ꣣भि꣡ गा अ꣢꣯चिक्रदत् । पु꣢नानो꣢꣫ वार꣣म꣡त्ये꣢ष्य꣣व्य꣡य꣢ꣳ श्ये꣣नो꣡ न योनिं꣢꣯ घृ꣣त꣡व꣢न्त꣣मा꣡स꣢दत् ॥१३१६॥

अ꣡सा꣢꣯वि । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣣रुषः꣡ । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ । रा꣡जा꣢꣯ । इ꣣व । दस्मः꣢ । अ꣣भि꣢ । गाः । अ꣣चिक्रदत् । पुनानः꣢ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡ति꣢꣯ । ए꣣षि । अव्य꣡य꣢म् । श्ये꣣नः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । घृ꣣त꣡व꣢न्तम् । आ । अ꣣सदत् ॥१३१६॥

Mantra without Swara
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत् । पुनानो वारमत्येष्यव्ययꣳ श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत् ॥

असावि । सोमः । अरुषः । वृषा । हरिः । राजा । इव । दस्मः । अभि । गाः । अचिक्रदत् । पुनानः । वारम् । अति । एषि । अव्ययम् । श्येनः । न । योनिम् । घृतवन्तम् । आ । असदत् ॥१३१६॥

Samveda - Mantra Number : 1316
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—सोमौषधि के पक्ष में। (अरुषः) चमकीले, (वृषा) रसवर्षक, (हरिः) हरे रंग के (सोमः) ओषधिराज सोम में से (असावि) मैंने रस निकाला है। (दस्मः) दर्शनीय यह, मानो (गाः अभि) गाय के दूध में मिलने के लिए (अचिक्रदत्) बोल रहा है, (राजा इव) जैसे कोई राजा (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक होता हुआ (गाः अभि) शत्रुओं की भूमियों पर आक्रमण करके (अचिक्रदत्) जयघोष करता है। हे ओषधिराज सोम ! (पुनानः) शुद्ध किये जाते हुए तुम (अव्ययं वारम् अत्येषि) भेड़ के बालों से बनी हुई दशापवित्र नामक छन्नी में से छनकर पार होते हो। देखो, यह ओषधिराज सोम (घृतवन्तम्) घृतयुक्त (योनिम्) यज्ञगृह में (आसदत्) आया है, (श्येनः न) जैसे वायु (घृतवन्तम्) जल-कणों से युक्त (योनिम्) अन्तरिक्ष में (आसदत्) आता है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (सोम) प्रेरक जीवात्मा (असावि) ऐश्वर्यवान् किया गया है। (अरुषः) ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान, (वृषा) ज्ञानवर्षक, (हरिः) देहरूप रथ को चलानेवाला, (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक यह आत्मा (गाः अभि) इन्द्रियों को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश करे, (राजा इव) जैसे कोई राजा (गाः अभि) प्रजाओं को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) राजनियमों की घोषणा करता है। हे जीवात्मन् ! तू (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (वारम् अति) रुकावट डालनेवाले विघ्नों को पार करके (अव्ययम्) अविनश्वर परमात्मा को (एषि) प्राप्त कर। (श्येनः न योनिम्) बाज पक्षी जैसे उड़ान भरने के लिए अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है, वैसे ही यह आत्मा (घृतवन्तम्) तेजस्वी (योनिम्) जगत् के कारण परमात्मा को (आसदत्) प्राप्त करे ॥१॥ यहाँ श्लेष और श्लिष्टोपमा अलङ्कार हैं। प्रथम व्याख्या में ‘अभि गा अचिक्रदत्’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥१॥
Essence
जैसे पक्षी उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँच जाते हैं, वैसे ही मनुष्य उन्नति करके परमात्मा को प्राप्त करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ सोम ओषधि का विषय और जीवात्मा का विषय वर्णित किया जा रहा है।