Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1309

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣣जा꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ पि꣡प्र꣢तः꣣ प्र꣡ यद्भर꣢꣯न्त꣣ व꣡ह्न꣢यः । वि꣡प्रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ वा꣡ह꣢सा ॥१३०९॥

प्र꣣जा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । पि꣡प्र꣢꣯तः । प्र । यत् । भ꣡र꣢꣯न्त । व꣡ह्न꣢꣯यः । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । ऋत꣡स्य꣢ । वा꣡ह꣢꣯सा ॥१३०९॥

Mantra without Swara
प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्भरन्त वह्नयः । विप्रा ऋतस्य वाहसा ॥

प्रजाम् । प्र । जाम् । ऋतस्य । पिप्रतः । प्र । यत् । भरन्त । वह्नयः । विप्राः । वि । प्राः । ऋतस्य । वाहसा ॥१३०९॥

Samveda - Mantra Number : 1309
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब (वह्नयः) ब्रह्मयज्ञ को वहन करनेवाले उपासक लोग (पिप्रतः) पालनकर्ता, (ऋतस्य) सत्य के (प्रजाम्) उत्पादक परमेश्वर को (प्रभरन्त) अन्तरात्मा में धारण कर लेते हैं, तब वे (विप्राः) विद्वान् जन (ऋतस्य) सत्य के (वाहसा) प्रचारक हो जाते हैं ॥३॥
Essence
सत्यज्ञान और सत्यकर्म के आदर्शरूप परमात्मा का अनुभव करके और अपने जीवन में सत्य को लाकर ही सत्य का प्रचार आसानी से हो सकता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ दशम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में सत्य का विषय है।