Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1267

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ पु꣣रु꣡ धि꣢यायते बृह꣣ते꣢ दे꣣व꣡ता꣢तये । य꣢त्रा꣣मृ꣡ता꣢स꣣ आ꣡श꣢त ॥१२६७॥

ए꣣षः꣢ । पु꣣रु꣢ । धि꣣यायते । बृहते꣢ । दे꣣व꣡ता꣢तये । य꣡त्र꣢꣯ । अ꣣मृ꣡ता꣢सः । अ꣣ । मृ꣡ता꣢꣯सः । आ꣡श꣢꣯त ॥१२६७॥

Mantra without Swara
एष पुरु धियायते बृहते देवतातये । यत्रामृतास आशत ॥

एषः । पुरु । धियायते । बृहते । देवतातये । यत्र । अमृतासः । अ । मृतासः । आशत ॥१२६७॥

Samveda - Mantra Number : 1267
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) यह सोम जीवात्मा (बृहते) महान् (देवतातये) मोक्ष पद के लाभार्थ (पुरु) बहुत अधिक (धियायते) ऋतम्भरा प्रज्ञा को पाना चाहता है, (यत्र) जिस मोक्षपद में (अमृतासः) पूर्व अमर जीवात्माएँ (आशते) विद्यमान हैं ॥२॥
Essence
मोक्ष की प्राप्ति के लिए मोक्ष की अभिलाषा, योगाभ्यास तथा सदाचार की अपेक्षा होती है ॥२॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।