Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1259

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ र꣢थर्यति꣣ प꣡व꣢मानो दिशस्यति । आ꣣वि꣡ष्कृ꣢णोति वग्व꣣नु꣢म् ॥१२५९॥

एषः꣢ । दे꣣वः꣢ । र꣣थर्यति । प꣡व꣢꣯मानः । दि꣣शस्यति । आविः꣢ । आ꣣ । विः꣢ । कृ꣣णोति । वग्वनु꣢म् ॥१२५९॥

Mantra without Swara
एष देवो रथर्यति पवमानो दिशस्यति । आविष्कृणोति वग्वनुम् ॥

एषः । देवः । रथर्यति । पवमानः । दिशस्यति । आविः । आ । विः । कृणोति । वग्वनुम् ॥१२५९॥

Samveda - Mantra Number : 1259
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) यह (देवः) कर्मफलों का भोक्ता जीव, कर्मफल भोगने के लिए (रथर्यति) शरीररूप रथ की इच्छा करता है। (पवमानः) शरीररूप रथ में जाता हुआ यह (दिशस्यति) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदियों को दिशा-निर्देश करता है और (वग्वनुम्) व्यक्त वाणी को (आविष्कृणोति) प्रकट करता अर्थात् उच्चारण करता है ॥४॥
Essence
जीवात्मा मानव-देह पाकर ज्ञान का सञ्चय, सत्कर्मों का आचरण और व्यक्त वाणी से दूसरों को उपदेश यदि करता है तो उसका मनुष्य-जन्म पाना सफल हो जाता है ॥४॥
Subject
आगे फिर जीवात्मा के विषय का वर्णन है।