Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1258

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ वा꣢र्या꣣ शू꣢रो꣣ य꣡न्नि꣢व꣣ स꣡त्व꣢भिः । प꣡व꣢मानः सिषासति ॥१२५८॥

ए꣣षः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । वा꣡र्या꣢꣯ । शू꣡रः꣢꣯ । यन् । इ꣣व । स꣡त्व꣢꣯भिः । प꣡व꣢꣯मानः । सि꣣षासति ॥१२५८॥

Mantra without Swara
एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्वभिः । पवमानः सिषासति ॥

एषः । विश्वानि । वार्या । शूरः । यन् । इव । सत्वभिः । पवमानः । सिषासति ॥१२५८॥

Samveda - Mantra Number : 1258
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(पवमानः) अपने को पवित्र करता हुआ (एषः) यह जीवात्मा (सत्त्वभिः) अपने पुरुषार्थों से (विश्वानि) सब (वार्या) वरणीय वस्तुओं को (सिषासति) प्राप्त करना चाहता है, (यन् इव) जैसे चलता हुआ (शूरः) कोई शूरवीर (विश्वानि वार्या) सब प्राप्तव्य स्थानों को प्राप्त कर लेता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
मनुष्य अपने पुरुषार्थ से सब अभीष्टों को पा सकता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में जीवात्मा का विषय है।