Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1257

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣡ विप्रै꣢꣯र꣣भि꣡ष्टु꣢तो꣣ऽपो꣢ दे꣣वो꣡ वि गा꣢हते । द꣢ध꣣द्र꣡त्ना꣢नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१२५७॥

ए꣣षः꣢ । वि꣡प्रैः꣢꣯ । वि । प्रैः꣣ । अभि꣡ष्टु꣢तः । अ꣣भि꣢ । स्तु꣣तः । अपः꣢ । दे꣣वः꣢ । वि । गा꣣हते । द꣡ध꣢꣯त् । र꣡त्ना꣢꣯नि । दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१२५७॥

Mantra without Swara
एष विप्रैरभिष्टुतोऽपो देवो वि गाहते । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

एषः । विप्रैः । वि । प्रैः । अभिष्टुतः । अभि । स्तुतः । अपः । देवः । वि । गाहते । दधत् । रत्नानि । दाशुषे ॥१२५७॥

Samveda - Mantra Number : 1257
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(विप्रैः) विद्वान् उपासकों से (अभिष्टुतः) अभिमुख होकर स्तुति किया गया (एषः) यह (देवः) कर्मफलप्रदाता परमेश्वर (अपः) मनुष्यों से किये गये कर्मों का (विगाहते) आलोडन अर्थात् निरीक्षण करता है और (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्ता शुभकर्मकारी मनुष्य को (रत्नानि) रमणीय फल (दधत्) प्रदान करता है ॥२॥
Essence
न्यायकारी परमेश्वर शुभकर्मों का शुभ फल और अशुभ कर्मों का अशुभ फल कर्म करनेवाले को देता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा द्वारा कर्मफल दिये जाने का वर्णन है।