Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1247

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ए꣡न्द्र꣢ नो गधि प्रिय꣣ स꣡त्रा꣢जिदगोह्य । गि꣣रि꣢꣫र्न वि꣣श्व꣡तः꣢ पृ꣣थुः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४७॥

आ꣢ । इ꣣न्द्र । नः । गधि । प्रिय । स꣡त्रा꣢꣯जित् । स꣡त्रा꣢꣯ । जि꣣त् । अगोह्य । अ । गोह्य । गिरिः꣢ । न । वि꣣श्व꣡तः꣢ । पृ꣣थुः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४७॥

Mantra without Swara
एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोह्य । गिरिर्न विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः ॥

आ । इन्द्र । नः । गधि । प्रिय । सत्राजित् । सत्रा । जित् । अगोह्य । अ । गोह्य । गिरिः । न । विश्वतः । पृथुः । पतिः । दिवः ॥१२४७॥

Samveda - Mantra Number : 1247
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (प्रिय) तृप्तिप्रदाता, (सत्राजित्) एक साथ सब शत्रुओं को जीत लेनेवाले, (अगोह्य) न छिपाये जा सकने योग्य अर्थात् सर्वत्र प्रकाशमान (इन्द्र) परमात्मन् ! आप (गिरिः न) बादल के समान (सर्वतः) सब ओर (पृथुः) प्रख्यात और (दिवः पतिः) तेजस्वी सूर्य के वा जीवात्मा के स्वामी हो ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
यद्यपि परमेश्वर चर्मचक्षु से दिखाई नहीं देता, तो भी वह सूर्य के समान सर्वत्र प्रकाशित, तृप्तिप्रदायक, सर्वविजेता, सुख आदि की वर्षा करने के कारण बादल के समान प्रसिद्धि-प्राप्त और सब जड़-चेतन जगत् का अधिपति है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३९३ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ फिर उसी विषय का वर्णन करते हैं।