Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1227

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दि꣣वः꣢ पी꣣यू꣡ष꣢मुत्त꣣म꣢꣫ꣳ सोम꣣मि꣡न्द्रा꣢य व꣣ज्रि꣡णे꣢ । सु꣣नो꣢ता꣣ म꣡धु꣢मत्तमम् ॥१२२७॥

दि꣣वः꣢ । पी꣣यू꣡ष꣢म् । उ꣣त्तम꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । व꣣ज्रि꣡णे꣢ । सु꣣नो꣡त꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तमम् ॥१२२७॥

Mantra without Swara
दिवः पीयूषमुत्तमꣳ सोममिन्द्राय वज्रिणे । सुनोता मधुमत्तमम् ॥

दिवः । पीयूषम् । उत्तमम् । सोमम् । इन्द्राय । वज्रिणे । सुनोत । मधुमत्तमम् ॥१२२७॥

Samveda - Mantra Number : 1227
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे उपासको ! तुम (दिवः) प्रकाशमान परमात्मा के पास से (पीयूषम्) अमृतरूप, (उत्तमम्) सर्वोत्कृष्ट, (मधुमत्तमम्) अतिशय मधुर (सोमम्) आनन्द-रस को (वज्रिणे इन्द्राय) वीर जीवात्मा के लिए (सुनोत) अभिषुत करो ॥३॥
Essence
अमृतरूप, अत्यन्त मधुर, ब्रह्मानन्द की महिमा जानकर भला कौन उसकी आकाङ्क्षा नहीं करेगा ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर ब्रह्मानन्द-रस का विषय है।