Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1215

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ त्वा꣢ श꣣तं꣢ च꣣ न꣢꣫ ह्रुतो꣣ रा꣢धो꣣ दि꣡त्स꣢न्त꣣मा꣡ मि꣢नन् । य꣡त्पु꣢ना꣣नो꣡ म꣢ख꣣स्य꣡से꣢ ॥१२१५॥

न । त्वा꣣ । शत꣢म् । च꣣ । न꣢ । ह्रु꣡तः꣢꣯ । रा꣡धः꣢꣯ । दि꣡त्स꣢꣯न्तम् । आ । मि꣣नन् । य꣢त् । पु꣣नानः꣢ । म꣣खस्य꣡से꣢ ॥१२१५॥

Mantra without Swara
न त्वा शतं च न ह्रुतो राधो दित्सन्तमा मिनन् । यत्पुनानो मखस्यसे ॥

न । त्वा । शतम् । च । न । ह्रुतः । राधः । दित्सन्तम् । आ । मिनन् । यत् । पुनानः । मखस्यसे ॥१२१५॥

Samveda - Mantra Number : 1215
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे दानवीर परमात्मन् वा दानी मनुष्य ! (यत्) जब (पुनानः) हमें पवित्र करते हुए आप (मखस्यसे) दानयज्ञ करने का संकल्प करते हो, तब (राधः) धन (दित्सन्तम्) दान करना चाहते हुए (त्वा) आपको (शतं च न) सौ भी (ह्रुतः) हमारे कुटिल भाव वा कुटिल जन (न आमिनन्) दान के मार्ग से विचलित नहीं कर सकते ॥३॥
Essence
जगदीश्वर उन्हीं को अपने दान का पात्र बनाता है, जो कुटिल नहीं हैं। दानवीर लोगों को चाहिए कि वे बाधक विघ्नों के बार-बार प्रहार होने पर भी अपने दान के व्रत को न छोड़ें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में दानवीर परमात्मा तथा दानी मनुष्य को सम्बोधन है।