Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1208

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ प꣢वस्व मदिन्तम प꣣वि꣢त्रं꣣ धा꣡र꣢या कवे । अ꣣र्क꣢स्य꣣ यो꣡नि꣢मा꣣स꣡द꣢म् ॥१२०८॥

आ । प꣣वस्व । मदिन्तम । पवि꣡त्र꣢म् । धा꣡र꣢꣯या । क꣣वे । अ꣣र्क꣡स्य꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ । सदम् ॥१२०८॥

Mantra without Swara
आ पवस्व मदिन्तम पवित्रं धारया कवे । अर्कस्य योनिमासदम् ॥

आ । पवस्व । मदिन्तम । पवित्रम् । धारया । कवे । अर्कस्य । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥१२०८॥

Samveda - Mantra Number : 1208
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (मदिन्तम) सबसे अधिक आनन्ददायक, (कवे) क्रान्तद्रष्टा सोम अर्थात् रसागार परमात्मन् ! आप (अर्कस्य) अर्चना करनेवाले जीवात्मा के (योनिम्) घर अर्थात् आनन्दमयकोश में (आसदम्) आसन जमाने के लिए (पवित्रम्) पवित्ररूप में (धारया) आनन्द-धारा के साथ (पवस्व) प्रवाहित होओ ॥४॥
Essence
परमात्मा से निकलकर बहती हुई आनन्द-धारा को प्राप्त करके जीवात्मा कृतार्थ हो जाता है ॥४॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।