Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 120

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवजामय इन्द्रमातर ऋषिकाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ ब꣢ला꣣द꣢धि꣣ स꣡ह꣢सो जा꣣त꣡ ओज꣢꣯सः । त्वꣳ सन्वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥१२०॥

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । ब꣡ला꣢꣯त् । अ꣡धि꣢꣯ । स꣡ह꣢꣯सः । जा꣣तः꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सः । त्व꣢म् । सन् । वृ꣣षन् । वृ꣡षा꣢꣯ । इत् । अ꣣सि ॥१२०॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः । त्वꣳ सन्वृषन्वृषेदसि ॥

त्वम् । इन्द्र । बलात् । अधि । सहसः । जातः । ओजसः । त्वम् । सन् । वृषन् । वृषा । इत् । असि ॥१२०॥

Samveda - Mantra Number : 120
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) परमवीर परमैश्वर्यवन् परमात्मन् और राजन् ! (त्वम्) आप (बलात्) अत्याचारियों के वध और सज्जन लोगों के धारण आदि के हेतु बल के कारण, (सहसः) मनोबलरूप साहस के कारण, और (ओजसः) आत्मबल के कारण (अधिजातः) प्रख्यात हो। (सन्) श्रेष्ठ (त्वम्) आप, हे (वृषन्) सुखों के वर्षक ! (वृषा इत्) वृष्टिकर्ता मेघ ही (असि) हो ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है। इन्द्र में वर्षक मेघ का आरोप होने से रूपक है। वृष-वृषे में छेकानुप्रास है ॥६॥
Essence
परमेश्वर और राजा के राक्षसवधादिरूप और पृथिवी, सूर्य आदि लोकों के तथा राष्ट्र के धारणरूप बहुत से बल के कार्य प्रसिद्ध हैं। उनका मनोबल और आत्मबल भी अनुपम है। उनका वृषा (बादल) नाम सार्थक है, क्योंकि वे बादल के समान सबके ऊपर सुख की वर्षा करते हैं। ऐसे अत्यन्त महिमाशाली परमेश्वर और राजा का हमें दिन-रात अभिनन्दन करना चाहिए ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र नाम से परमेश्वर और राजा की महिमा का वर्णन है।