Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1199

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दि꣣वो꣡ नाभा꣢꣯ विचक्ष꣣णो꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢ महीयते । सो꣢मो꣣ यः꣢ सु꣣क्र꣡तुः꣢ क꣣विः꣢ ॥११९९॥

दि꣣वः꣢ । ना꣡भा꣢꣯ । वि꣣चक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯ । म꣣हीयते । सो꣡मः꣢꣯ । यः । सु꣣क्र꣡तुः꣢ । सु꣣ । क्र꣡तुः꣢꣯ । क꣣विः꣢ ॥११९९॥

Mantra without Swara
दिवो नाभा विचक्षणोऽव्या वारे महीयते । सोमो यः सुक्रतुः कविः ॥

दिवः । नाभा । विचक्षणः । वि । चक्षणः । अव्याः । वारे । महीयते । सोमः । यः । सुक्रतुः । सु । क्रतुः । कविः ॥११९९॥

Samveda - Mantra Number : 1199
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(विचक्षणः) सर्वद्रष्टा (सोमः) परमेश्वर, (यः) जो (सुक्रतुः) शुभकर्म करनेवाला और (कविः) जगद्रूप दृश्य काव्य का तथा वेदरूप श्रव्य काव्य का कवि है, वह (दिवः) तेजस्वी जीवात्मा के (नाभा) केन्द्रभूत प्राण में और (अव्याः वारे) प्रकृति के बाल के समान विद्यमान अर्थात् प्रकृति से निकले हुए व्यक्त जगत् में (महीयते) महिमा प्राप्त करता है ॥ अथर्व० १०।८।३१ में कहा गया है कि अवि नाम की एक देवता है, जो ऋत से परिवृत है, उसी के रूप से ये वृक्ष हरे और हरित माला को धारण करनेवाले बने हुए हैं। इस प्रमाण से अवि शब्द प्रकृतिवाचक होता है ॥४॥
Essence
जड़-चेतनरूप सब जगत् में अन्तर्यामी रूप से विद्यमान, सर्वज्ञ सब कर्मों को करनेवाला जगदीश्वर सर्वत्र कीर्ति प्राप्त किये हुए है ॥४॥
Subject
अब परमात्मा की महिमा का वर्णन है।