Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1185

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नृ꣣च꣡क्ष꣢सं त्वा व꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯पीतꣳ स्व꣣र्वि꣡द꣢म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ प्र꣣जा꣡मिष꣢꣯म् ॥११८५॥

नृच꣡क्ष꣢꣯सम् । नृ꣣ । च꣡क्ष꣢꣯सम् । त्वा꣣ । वय꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯पीतम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । पी꣣तम् । स्वर्वि꣡द꣢म् । स्वः꣣ । वि꣡द꣢꣯म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ । प्र꣣जा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् ॥११८५॥

Mantra without Swara
नृचक्षसं त्वा वयमिन्द्रपीतꣳ स्वर्विदम् । भक्षीमहि प्रजामिषम् ॥

नृचक्षसम् । नृ । चक्षसम् । त्वा । वयम् । इन्द्रपीतम् । इन्द्र । पीतम् । स्वर्विदम् । स्वः । विदम् । भक्षीमहि । प्रजाम् । प्र । जाम् । इषम् ॥११८५॥

Samveda - Mantra Number : 1185
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम अर्थात् जगत् को पैदा करनेवाले, रस के भण्डार परमात्मन् ! (नृचक्षसम्) मनुष्यों के द्रष्टा, (इन्द्रपीतम्) उपासक जीवात्माओं से तन्मय होकर पिये गये, (स्वर्विदम्) दिव्य प्रकाश वा मोक्षसुख प्राप्त करानेवाले (त्वा) आपको (वयम्) हम आपके उपासक पुकार रहे हैं। हम आपसे (प्रजाम्) सद्गुणरूप सन्तान और (इषम्) अभीष्ट आनन्द-रस की धारा (भक्षीमहि) प्राप्त करें ॥८॥
Essence
परमेश्वर का बार-बार ध्यान करके उपासक दिव्य आनन्द-रस को और मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।