Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1182

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दे꣣वे꣡भ्य꣢स्त्वा꣣ म꣡दा꣢य꣣ क꣡ꣳ सृ꣢जा꣣न꣡मति꣢꣯ मे꣣꣬ष्यः꣢꣯ । सं꣡ गोभि꣢꣯र्वासयामसि ॥११८२॥

देवे꣡भ्यः꣢꣯ । त्वा꣣ । म꣡दा꣢꣯य । कम् । सृ꣣जान꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । मे꣣ष्यः꣢꣯ । सम् । गो꣡भिः꣢꣯ । वा꣣सयामसि ॥११८२॥

Mantra without Swara
देवेभ्यस्त्वा मदाय कꣳ सृजानमति मेष्यः । सं गोभिर्वासयामसि ॥

देवेभ्यः । त्वा । मदाय । कम् । सृजानम् । अति । मेष्यः । सम् । गोभिः । वासयामसि ॥११८२॥

Samveda - Mantra Number : 1182
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमेश्वर ! (मेष्यः) सींचनेवाली आनन्द-धाराएँ (अति सृजानम्) छोड़ते हुए, (कम्) सुखस्वरूप (त्वा) तुझे (देवेभ्यः) आत्मा, मन बुद्धि आदि के (मदाय) हर्ष के लिए हम (गोभिः) स्तुति-वाणियों से (संवासयामसि) संछादित करते हैं ॥५॥
Essence
जगत्पति परमेश्वर उपासकों को आनन्द की धाराओं से सींचता हुआ और उनके आत्मा, मन, बुद्धि आदियों को तृप्त करता हुआ उनका उपकार करता है ॥५॥
Subject
अब जगदीश्वर को सम्बोधन करते हैं।