Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1181

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मृ꣣ज꣡न्ति꣢ त्वा꣣ द꣢श꣣ क्षि꣡पो꣢ हि꣣न्व꣡न्ति꣢ स꣣प्त꣢ धी꣣त꣡यः꣢ । अ꣢नु꣣ वि꣡प्रा꣢ अमादिषुः ॥११८१॥

मृ꣣ज꣡न्ति꣢ । त्वा꣣ । द꣡श꣢꣯ । क्षि꣡पः꣢꣯ । हि꣣न्व꣡न्ति꣢ । स꣣प्त꣢ । धी꣣त꣡यः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । अमादिषुः ॥११८१॥

Mantra without Swara
मृजन्ति त्वा दश क्षिपो हिन्वन्ति सप्त धीतयः । अनु विप्रा अमादिषुः ॥

मृजन्ति । त्वा । दश । क्षिपः । हिन्वन्ति । सप्त । धीतयः । अनु । विप्राः । वि । प्राः । अमादिषुः ॥११८१॥

Samveda - Mantra Number : 1181
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) कर्मानुसार मानव-शरीर में भेजे गए जीवात्मन् ! (दश क्षिपः) दस प्राण (त्वा) तुझे (मृजन्ति) अलंकृत करते हैं। (सप्त धीतयः) मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ये सात ज्ञान-साधन तुझे(हिन्वन्ति) तृप्त करते हैं। (विप्राः) मेधावी विद्वज्जन तुझे (अनु अमादिषुः) साथ-साथ उत्साहित करते हैं ॥४॥
Essence
जीवात्मा को परमेश्वर ने सब परमोत्कृष्ट साधनों के साथ शरीर में प्रविष्ट किया है, अतः वहाँ निवास करते हुए उसे पूर्ण उन्नति करनी चाहिए ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में जीवात्मा का विषय है।