Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1169

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वं꣡ न꣢ इ꣣न्द्रा꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जो꣢ नृ꣣म्ण꣡ꣳ श꣢तक्रतो विचर्षणे । आ꣢ वी꣣रं꣡ पृ꣢तना꣣स꣡ह꣢म् ॥११६९॥

त्व꣢म् । नः꣣ । इन्द्र । आ꣢ । भ꣣र । ओ꣡जः꣢꣯ । नृ꣣म्ण꣢म् । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । विचर्षणे । वि । चर्षणे । आ꣢ । वी꣣र꣢म् । पृ꣣तनास꣡ह꣢म् । पृतना । सहम् ॥११६९॥

Mantra without Swara
त्वं न इन्द्रा भर ओजो नृम्णꣳ शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनासहम् ॥

त्वम् । नः । इन्द्र । आ । भर । ओजः । नृम्णम् । शतक्रतो । शत । क्रतो । विचर्षणे । वि । चर्षणे । आ । वीरम् । पृतनासहम् । पृतना । सहम् ॥११६९॥

Samveda - Mantra Number : 1169
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शतक्रतो) बहुत बुद्धिमान्, (विचर्षणे) शिष्यों पर दृष्टि रखनेवाले, (इन्द्र) क्षात्रधर्म के शिक्षक आचार्य ! (त्वम्) आप (नः) हमें (ओजः) उत्साह और (नृम्णम्) बल (आ भर) प्रदान कीजिए। साथ ही (पृतनासहम्) शत्रु सेनाओं को हरानेवाला (वीरम्) वीर क्षत्रिय योद्धा (आ) प्रदान कीजिए ॥१॥
Essence
उस-उस विद्या में निष्णात गुरु ही ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य राष्ट्र के लिए उत्पन्न करता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४०५ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ क्षात्रधर्म के शिक्षक आचार्य को कह रहे हैं।