Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1166

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ ते꣢ व꣣त्सो꣡ मनो꣢꣯ यमत्पर꣣मा꣡च्चि꣢त्स꣣ध꣡स्था꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣡ का꣢मये गि꣣रा꣢ ॥११६६॥

आ꣢ । ते꣣ । वत्सः꣢ । म꣡नः꣢꣯ । य꣣मत् । परमा꣢त् । चि꣣त् । सध꣡स्धा꣢त् । स꣣ध꣢ । स्था꣣त् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । त्वाम् । का꣣मये । गिरा꣢ ॥११६६॥

Mantra without Swara
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात् । अग्ने त्वां कामये गिरा ॥

आ । ते । वत्सः । मनः । यमत् । परमात् । चित् । सधस्धात् । सध । स्थात् । अग्ने । त्वाम् । कामये । गिरा ॥११६६॥

Samveda - Mantra Number : 1166
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) अग्रनायक, सर्वज्ञ, तेजस्वी परमात्मन् ! मैं (गिरा) स्तुति-वाणी से (त्वाम् कामये) तुझे चाहता हूँ। (ते वत्सः) तेरा पुत्र तुझे पाने के लिए (परमात् चित्) सुदूर भी (सधस्थात्) लोक से (मनः) अपने मन को (आयमत्) लौटा लाया है ॥१॥
Essence
समीप वा दूर जहाँ-कहीं भी मेरा मन चला गया है, वहाँ से उसे लौटाकर परमात्मा में ही केन्द्रित करता हूँ ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ भी उसी विषय को दर्शाते हैं।