Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 116

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡स्ते꣢ नू꣣न꣡ꣳ श꣢तक्रत꣣वि꣡न्द्र꣢ द्यु꣣म्नि꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ । ते꣡न꣢ नू꣣नं꣡ मदे꣢꣯ मदेः ॥११६॥

यः꣢ । ते꣣ । नून꣢म् । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । इ꣡न्द्र꣢꣯ । द्यु꣣म्नि꣡त꣢मः । म꣡दः꣢꣯ । ते꣡न꣢꣯ । नू꣣न꣢म् । म꣡दे꣢꣯ । म꣣देः ॥११६॥

Mantra without Swara
यस्ते नूनꣳ शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मदः । तेन नूनं मदे मदेः ॥

यः । ते । नूनम् । शतक्रतो । शत । क्रतो । इन्द्र । द्युम्नितमः । मदः । तेन । नूनम् । मदे । मदेः ॥११६॥

Samveda - Mantra Number : 116
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शतक्रतो) बहुत प्रज्ञाओं, कर्मों, यज्ञों और संकल्पोंवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यः) जो (ते) आपका (नूनम्) निश्चय ही (द्युम्नितमः) सबसे अधिक यशोमय (मदः) आनन्द है, (तेन) उससे (नूनम्) आज हमें भी (मदे) आनन्द में (मदेः) मग्न कर दीजिए ॥२॥
Essence
परमात्मा का आनन्द-रस जिन्होंने चख लिया है, वे उस रस की कीर्ति को गाते नहीं थकते। वह रस-रूप है यह तत्त्ववेत्ताओं का अनुभव है। सबको चाहिए कि उसके रस को प्राप्त कर अपने आपको धन्य करें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र परमात्मा से याचना की गयी है।