Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1148

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि꣣ तू꣡तु꣢जान꣣ उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि हरिवः । सु꣣ते꣡ द꣢धिष्व न꣣श्च꣡नः꣢ ॥११४८॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । आ । या꣣हि । तू꣡तु꣢꣯जानः । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । ह꣣रिवः । सुते꣢ । द꣣धिष्व । नः । च꣡नः꣢꣯ ॥११४८॥

Mantra without Swara
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥

इन्द्र । आ । याहि । तूतुजानः । उप । ब्रह्माणि । हरिवः । सुते । दधिष्व । नः । चनः ॥११४८॥

Samveda - Mantra Number : 1148
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (हरिवः) परस्पर आकर्षणवाले सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोकों के स्वामी (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (तूतुजानः) शीघ्रता करते हुए, हमारे (ब्रह्माणि) स्तोत्रों के (उप आ याहि) समीप आओ। (नः) हमारे (सुते) पुत्र आदि सन्तान में (चनः) उपासना से मिलनेवाला आनन्द-रस (दधिष्व) धारण कराओ ॥३॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि सपरिवार परमेश्वरोपासना का आनन्द-रस प्रतिदिन प्राप्त करके दैनिक कार्यों में प्रवृत्त हों ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर उसी विषय का वर्णन है।